हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। वैश्विक मानचित्र पर अगर रूस और यूक्रेन की बात की जाए तो दोनों इस वक्त एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन बने बैठे हुए हैं। पिछले कई सालों से रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है।
राजनैतिक और कूटनीतिक तरीकों से दोनों देशों के बीच सुलह करवाने की कई कोशिशें की जा रही हैं लेकिन सब कुछ नाकाम। रूस और यूक्रेन के बीच चल रही यह जंग कब थमेगी कोई नहीं जानता। वहीं इस सिक्के का एक और पहलू भी है।
दोनों देश एक-दूसरे के पड़ोसी। यहां कोई गोली-बंदूक और बमबारी की बात नहीं करता। यहां बात होती है तो सिर्फ किताबों की, साहित्य की और संस्कृति की। इसे एक इत्तेफाक ही कहा जा सकता है कि अंतर्राष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेला 2026 में रूस और यूक्रेन के स्टॉल एक-दूसरे के आस-पड़ोस में ही बनाए गए हैं। लेकिन यहां कोई शोर नहीं...है तो बस किताबों की खुशबू।
पुस्तक मेले में रूस के स्टॉल पर प्रवेश करते ही आपको सबसे पहले ब्लैक एंड व्हाइट कई तस्वीरें दिखाई देंगी। इन तस्वीरों के जरिए लेनिनवाद और मार्क्सवाद के इतिहास, उनके टकराव और उसकी भीषण परिणाम को दर्शाने की कोशिशें की गयी है।
खास बात है कि स्टॉल पर हिंदी, अंग्रेजी और बांग्ला तीन भाषाओं में अनुवादित रूसी लेखकों की कई किताबें देखने को मिलेंगी जिनमें कुछ तो दुर्लभ भी हैं, लेकिन इन्हें बेचा नहीं जा रहा है। हां, स्टॉल पर मौजूद गोर्की सदन के प्रोग्राम ऑफिसर गौतम घोष यहां आने वाले हर पाठक को उन स्टॉल्स के बारे में जरूर बता दे रहे हैं जहां वह किताबें मिलेंगी।
किताबों के प्रति आकर्षण कभी कम नहीं होगा
क्या आज के डिजिटल जमाने में पाठक किताबों से दूर भागते जा रहे हैं? क्या किताबों की जगह ऑनलाइन PDF वाली किताबें ले लेंगी? किताबों के बारे में अक्सर यह सवाल उठता है। लेकिन गौतम घोष ने इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि लोगों के मन में किताबों की जगह कोई नहीं ले सकता है।
ऑनलाइन या PDF वाली किताबें सिर्फ वहीं लोग ढूंढते या पढ़ते हैं जिन्हें कागज वाली कोई किताब कहीं भी नहीं मिल रही होती है या आर्थिक तौर पर किताबें खरीदना उनके बस की बात नहीं होती है। किताबों का आकर्षण हमेशा से था, है और बना रहेगा।
रूसी भाषा के प्रति बढ़ा है आकर्षण
घोष बताते हैं कि खासतौर पर अगर कोलकाता की बात की जाए तो रूसी लेखकों के किताबों के प्रति कोलकाता के लोगों में हमेशा से ही आकर्षण रहा है, जिसमें आज भी कोई कमी नहीं आयी है। इसके साथ ही अब लोग रूसी भाषा सीखने की ओर भी आकर्षित हो रहे हैं।
रूसी भाषा का कोर्स करके रुस में काम करने का विकल्प खुलेगा या नहीं, रोजगार के अवसर मिलेंगे या नहीं...लोगों के मन में अब ये सवालें घूमती हैं। बड़ी संख्या में लोगों को पता नहीं है कि गोर्की सदन में रूसी भाषा सीखने का कोर्स करवाया जाता है। जब कोई स्कूली छात्र मुझसे इस बारे में पूछता हूं और मैं उनसे कहता हूं कि 12वीं की डिग्री मिलने से पहले यह कोर्स करना संभव नहीं है तो उन बच्चों का चेहरा उतर जाता है।
यहां सिर्फ हो किताबों की बातें
रूस और यूक्रेन का युद्ध खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है लेकिन अंतर्राष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेला 2026 में रूस-यूक्रेन का पड़ोसी है। क्या प्रतिक्रिया देंगे? यह पूछने पर गौतम घोष कहते हैं कि पुस्तक मेला इन बातों की जगह नहीं है। इसलिए मैं यहां इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। मैं कुछ कहूंगा, उसकी प्रतिक्रिया में कोई और कुछ कहेगा। उससे बात बढ़ जाएगी और पुस्तक मेले का इतना अच्छा माहौल खराब हो जाएगा। यहां सिर्फ किताबों के बारे में ही बात करनी चाहिए।
हर भाषा में है मांग
गौतम घोष का मानना है कि रूसी लेखकों की किताबें जिन्हें हिंदी, बांग्ला और अंग्रेजी भाषा में ट्रांसलेट किया गया है। उनकी मांग हर भाषा में ही है। कोलकाता में हिंदी किताबों की मांग ज्यादा नहीं है लेकिन बांग्ला और अंग्रेजी भाषा में अनुवादित किताबें यहां के लोगों को खूब पसंद आती है। वहीं हिंदी भाषा में रूसी लेखकों की किताबें दिल्ली और ऐसे राज्य जहां हिंदी भाषी लोग ज्यादा हैं, वहां बहुत ज्यादा होती है। इसलिए किसी एक भाषा में इन किताबों की मांग है और किसी में नहीं...ऐसा बिल्कुल नहीं कहा जा सकता है।
प्रसेनजीत को इतने सालों बाद आखिरकार मिल रहा सम्मान
गौतम घोष का कहना है कि बहुत अच्छा लगा यह सुनकर कि प्रसेनजीत चटर्जी पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित हुए। उनका कहना है कि वह (प्रसेनजीत) पिछले कई दशकों से कमर्शियल और नॉन-कमर्शियल फिल्मों में सक्रिय हैं। लेकिन उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार हैं। अब तो कई बार ऐसे लोगों भी बड़े-बड़े सम्मान मिल जाते हैं जिनको कोई पहचानता भी नहीं है। ऐसे में प्रसेनजीत को यह सम्मान मिलना, बहुत अच्छा लग रहा है।