कोलकाता : पुस्तकों के प्रति प्रेम की कोई उम्र नहीं होती- इस कहावत को 94 वर्ष से अधिक आयु के निरंजन मंडल ने एक बार फिर सच कर दिखाया। हर साल की तरह इस बार भी वे अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले (बोई मेला) में पहुँचे। उम्र और झुकी हुई कमर के बावजूद उनकी चाल में गजब की तेजी और आँखों में किताबों को लेकर वही पुरानी चमक दिखाई दी। इस बार उन्होंने आशंका जताई थी कि शायद उम्र के कारण पुस्तक मेले में जाना संभव न हो लेकिन परिवार के सहयोग से वे कल मेले में पहुँचे और बेहद प्रसन्न नजर आए।
निरंजन मंडल का दिन आज भी नाश्ते के साथ पढ़ने से शुरू होता है। स्वामी विवेकानंद, रवींद्रनाथ ठाकुर और महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों पर लिखी किताबें उनके अध्ययन का मुख्य विषय हैं। इस बार वे विशेष रूप से बच्चों की किताबें खरीदने आए थे जिन्हें वे अपनी नाती-पोतों को उपहार में देना चाहते हैं। साथ ही लेखक कुणाल बसु की नई पुस्तक “सुभाष, लौट आए थे” भी उनकी खरीद सूची में शामिल रही।
भीड़ भरे मेले में वे किसी विशेष पुस्तक की तलाश में स्टॉल-दर-स्टॉल पूछते नजर आए। बातचीत में उन्होंने बताया कि वे 1990 के आसपास एक सरकारी स्कूल से प्रधान अध्यापक के रूप में सेवानिवृत्त हुए। सेवा निवृत्ति के बाद भी उन्होंने हर साल पुस्तक मेले में आने की कोशिश की है। एक-दो वर्षों को छोड़ दें तो वे लगभग हर वर्ष यहाँ पहुँचते रहे हैं।
इस बार वे अपने बेटे, बहू और पोती के साथ मेले में आए थे। परिवार के अनुसार, पुस्तक मेला उनके लिए सिर्फ खरीदारी नहीं, बल्कि जीवन भर के ज्ञान और संस्कारों से जुड़ा एक उत्सव है।