कोलकाता : पश्चिम बंगाल में ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कार्यरत एक संगठन इन दिनों खास चर्चा में है। यह संगठन पिछले 10 -15 वर्षों से पश्चिम बंगाल के साथ-साथ बिहार और झारखंड के किसानों को रासायनिक मुक्त खेती की ओर प्रेरित कर रहा है। संगठन का मानना है कि यूरिया, डीएपी जैसे सिंथेटिक उर्वरक मिट्टी की प्राकृतिक संरचना को नुकसान पहुंचाते हैं। इनके अत्यधिक उपयोग से केंचुए जैसे मिट्टी के मित्र जीव, सूक्ष्म जीवाणु और माइक्रो-फ्लोरा नष्ट हो जाते हैं, जो नाइट्रोजन फिक्सेशन, पोषक तत्वों के अवशोषण और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।
संगठन गोबर खाद, वर्मी कंपोस्ट, नदीप कंपोस्ट और हरी खाद के माध्यम से खेती को पुनर्जीवित कर रहा है। इसके तहत धान, गेहूं, दालें, मसूर, मूंग, हल्दी, मसाले, चाय, सरसों का तेल, शहद, सब्जियां और पारंपरिक बंगाली धान की किस्में जैसे गोविंद, जमुनी और बलम चावल का ऑर्गेनिक उत्पादन किया जा रहा है। साथ ही इन पारंपरिक बीजों का संरक्षण और विकास भी किया जा रहा है।
पश्चिम बंगाल सरकार के मार्केटिंग बोर्ड द्वारा स्थापित “ऑर्गेनिक हाट” न्यू टाउन में इस संगठन से जुड़े किसानों के अलग-अलग स्टॉल लगाए गए हैं जहां किसान सीधे उपभोक्ताओं तक अपना उत्पाद पहुंचा रहे हैं। यहां सप्ताहांत में खास तौर पर बड़ी संख्या में लोग ऑर्गेनिक उत्पाद खरीदने पहुंचते हैं।
संगठन से जुड़े डॉ. विश्वनाथ चटर्जी के अनुसार यह पहल केवल व्यापार नहीं बल्कि जन-जागरूकता का माध्यम है। स्टॉल पर लोगों को निःशुल्क जानकारी दी जाती है कि ऑर्गेनिक भोजन क्यों जरूरी है और यह बढ़ती बीमारियों से कैसे बचाव कर सकता है।