कोलकाता : अंतरराष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेला प्रांगण स्थित वाणी प्रकाशन के साहित्य घर में ‘बंगाल में हिंदी रंगमंच और पुस्तक संस्कृति’ विषय पर एक विचारोत्तेजक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर वरिष्ठ आलोचक शंभुनाथ, वरिष्ठ रंगकर्मी महेश जायसवाल, समीक्षक मृत्युंजय श्रीवास्तव, लिटिल थेस्पियन की रंगकर्मी उमा झुनझुनवाला, रंगकर्मी राकेश त्रिपाठी और रंग शिल्पी संस्था के अभिनेता प्लाबन बसु ने बंगाल में हिंदी रंगमंच, पुस्तक संस्कृति और रंगकर्म की वर्तमान स्थिति पर विस्तार से चर्चा की।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक शंभुनाथ ने कहा कि नाटक का जन्म प्रतिवाद से हुआ है। नाटक हमारी प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा का अभिन्न हिस्सा रहा है लेकिन नए इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के उदय ने इस परंपरा को हाशिये पर ला दिया है। उन्होंने कहा कि नाटकार हमेशा से बहिष्कृत रहा है फिर भी नाटक सामाजिक चेतना का सशक्त माध्यम बना हुआ है।
वरिष्ठ रंगकर्मी महेश जायसवाल ने नुक्कड़ नाटक को एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधा बताते हुए कहा कि हिंदी नाटकों को हिंदी दर्शकों का समर्थन मिलना चाहिए। नाट्य प्रस्तुति के साथ-साथ दर्शक वर्ग तैयार करना समय की मांग है। उन्होंने नाटक को प्रयोगधर्मी बनाने और पुस्तक संस्कृति को मजबूत करने पर जोर दिया।
समीक्षक मृत्युंजय श्रीवास्तव ने कहा कि नाटककार का दायित्व है कि वह सामाजिक प्रश्नों से दर्शकों को जोड़े। उमा झुनझुनवाला ने कहा कि बंगाल में हिंदी नाटकों की अपार संभावनाएं हैं हालांकि दर्शकों, विभिन्न विभागों और हिंदी भाषा-भाषियों का पूरा सहयोग अभी मिलना बाकी है। उन्होंने रंगमंच के व्याकरण के विस्तार और पालन की आवश्यकता बताई।
प्लाबन बसु ने कहा कि बंगाल के हिंदी नाटकों पर यहां की सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय नाट्य स्कूल का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। उन्होंने हिंदी नाटकों को पर्याप्त सरकारी अनुदान देने की मांग की। राकेश त्रिपाठी ने अभिनय और निर्देशन के साथ-साथ प्रकाश योजना में दक्षता को आजीविका से जोड़ने की बात कही। संस्कृति नाट्य मंच के संचालक डॉ. इबरार खान ने बंगाल की नाट्य परंपरा से प्रेरणा लेकर हिंदी नाटक को समृद्ध करने पर बल दिया।
इस अवसर पर अभिनेत्री अवेरी जी, भोला साहा, टीना परवीन, गायत्री बाल्मीकि, रिया श्रीवास्तव, स्वीटी महतो, आसिफ अंसारी, गुंजन झुनझुनवाला, चंदन भगत, अग्रहरि जी, नैना प्रसाद, राकेश कुमार, प्रियंका, चंदन चौधरी और सुमित कुमार सहित बड़ी संख्या में श्रोता उपस्थित रहे। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए संस्कृति कर्मी संजय जायसवाल ने कहा कि सांस्कृतिक संकट के इस दौर में पुस्तक और नाटक हमारी रचनात्मकता और संवेदना को विस्तार देने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।