कोलकाताः पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के विधायकों की मौजूदगी और उनकी सक्रियता को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म है। हाल ही में कालीघाट में हुई तृणमूल विधायक दल की बैठक के बाद जहां संगठनात्मक गतिविधियां तेज हुई हैं, वहीं विधायकों की विधानसभा में कम उपस्थिति को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं।
मंगलवार को कालीघाट स्थित पार्टी कार्यालय में हुई बैठक में कुल 80 में से 65 विधायक मौजूद थे। इसके अगले दिन बुधवार को विधानसभा परिसर में तृणमूल के करीब 31 विधायक ही दिखाई दिए। इस अंतर ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया है।
बुधवार को विधानसभा परिसर में अंबेडकर प्रतिमा के पास तृणमूल विधायकों ने विरोध प्रदर्शन भी किया। यह प्रदर्शन पोस्ट-पोल हिंसा, हॉकर्स को हटाने और बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ था। इस दौरान शोभनदेव चट्टोपाध्याय, फिरहाद हकीम, नयना बंद्योपाध्याय, असिमा पात्र, पुलक राय और गोलाम रब्बानी समेत कई विधायक मौजूद रहे। करीब आधे घंटे तक चले इस प्रदर्शन में नारेबाजी और प्लेकार्ड के साथ विरोध जताया गया।
विपक्ष का कहना है कि तृणमूल के कई विधायक अब विधानसभा की बजाय सड़क पर अधिक सक्रिय दिख रहे हैं, जबकि विधानसभा में उनकी उपस्थिति कम हो रही है। इस पर तृणमूल की ओर से सफाई दी गई है कि सभी विधायकों को अलग-अलग जिम्मेदारियां दी गई हैं। पार्टी के अनुसार एक समूह विधानसभा में विरोध और गतिविधियों में लगा है, जबकि दूसरा समूह अपने-अपने क्षेत्रों में जनता के साथ संपर्क और प्रशासनिक समन्वय का काम कर रहा है।
इसी बीच विपक्षी दल भाजपा ने तंज कसते हुए कहा कि अगर राजनीतिक हालात बदलते हैं तो तृणमूल के कई नेता सक्रिय राजनीति से दूर हो सकते हैं।
विधानसभा में विपक्षी नेता के चयन को लेकर भी स्थिति पूरी तरह साफ नहीं हुई है। कालीघाट बैठक में सर्वसम्मति से शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्षी दल का नेता चुना गया था और फिरहाद हकीम को चीफ व्हिप बनाया गया था। लेकिन विधानसभा सचिवालय की ओर से अभी तक इस फैसले को औपचारिक मान्यता नहीं मिली है।
इसी वजह से विपक्षी नेता के पद की आधिकारिक घोषणा लंबित है। पार्टी अब नए सिरे से दस्तावेज भेजने की तैयारी में है ताकि प्रक्रिया पूरी की जा सके।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच विधानसभा के अंदर और बाहर तृणमूल की सक्रियता, विधायकों की उपस्थिति और संगठनात्मक रणनीति पर राजनीतिक बहस लगातार जारी है।