चुनाव आयोग ने पहले ही कहा था कि SIR की सुनवाई के ‘स्थायी निवासी प्रमाणपत्र’ को स्वीकार नहीं किया जाएगा। सुनवाई के आखिरी दिन (शनिवार, 7 फरवरी) चुनाव आयोग ने घोषणा कर दी कि ‘स्थायी निवासी प्रमाणपत्र’ को स्वीकार किया जाएगा। हालांकि यह प्रमाणपत्र सिर्फ डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट/एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट/सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किया हुआ होना चाहिए।
चुनाव आयोग ने SIR शुरू होने से पहले सुनवाई के लिए 11 विशेष दस्तावेज तय कर दिए थे। इस सूची में ‘स्थायी निवासी प्रमाणपत्र’ या डोमिसाइल सर्टिफिकेट भी शामिल था। हालांकि बाद में यह घोषणा की गई कि पश्चिम बंगाल में SIR के लिए इस सर्टिफिकेट पर विचार नहीं किया जाएगा।
प्राथमिक तौर पर राज्य सरकार से यह पूछा गया कि ऐसे प्रमाणपत्र कैसे जारी किए जाते हैं। राज्य सरकार ने बताया कि 1999 तक सिर्फ जिलाधिकारी ही ये सर्टिफिकेट जारी करते थे। बाद में अतिरिक्त जिलाधिकारी और SDO ने भी ये सर्टिफिकेट जारी करना शुरू कर दिया।
हालांकि चुनाव आयोग ने आरोप लगाया कि राज्य में जिस तरीके से ये सर्टिफिकेट जारी किए जा रहे हैं वह सरकारी दिशानिर्देशों के मुताबिक नहीं है। आरोप यहां तक लगे कि कई मामलों में ये सर्टिफिकेट नगर पालिकाओं ने जारी किए थे।
हालांकि 6 फरवरी को जारी एक नोटिफिकेशन में चुनाव आयोग ने कहा कि ERO/AERO केवल जिलाधिकारी/अतिरिक्त जिलाधिकारी/सबडिविजन मजिस्ट्रेट द्वारा जारी सर्टिफिकेट ही स्वीकार कर सकेंगे। गौरतलब है कि राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने देश के मुख्य चुनाव ज्ञानेश कुमार को चिट्ठी लिखकर पूछा था कि 'स्थायी निवासी प्रमाणपत्र' को क्यों स्वीकार नहीं किया जा रहा है?
उन्होंने सवाल किया कि सिर्फ पश्चिम बंगाल के मामले में ही अलग नियम क्यों लागू किए जा रहे हैं। गत बुधवार को भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी SIR केस की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर बहस करती नजर आईं।