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अन्नपूर्णा जैसी योजनाओं के लाभार्थियों के चयन का आधार बनेगा SIR, शुभेंदु की राह पर चला बिहार

संशोधित वोटर लिस्ट से तय होगा लाभ, किन्हें मिलेगा अनुदान और कौन होगा बाहर?

कोलकाताः पश्चिम बंगाल में नई सरकार की सामाजिक कल्याण योजनाओं को लेकर बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अब सरकारी अनुदान और लाभकारी योजनाओं में लाभार्थियों का चयन संशोधित मतदाता सूची (SIR) के आधार पर किया जाएगा। इसका मतलब यह कि जिनका नाम वोटर लिस्ट से हट चुका है, उन्हें कई सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलेगा।

इस नीति के तहत यह तय किया जा रहा है कि अन्नपूर्णा जैसी योजनाओं में किन लोगों को आर्थिक सहायता दी जाएगी और किन्हें सूची से बाहर किया जाएगा। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य सिस्टम में पारदर्शिता लाना और अपात्र लाभार्थियों को हटाना है।

सरकार के अनुसार, वोटर लिस्ट में जिन लोगों के नाम मृत, स्थानांतरित या अपात्र के रूप में हटाए गए हैं, उन्हें सामाजिक योजनाओं से बाहर किया जाएगा। वहीं जिनके मामले न्यायालय या ट्रिब्यूनल में लंबित हैं, उनके नाम फिलहाल लाभार्थी सूची में बने रहेंगे। सरकारी पक्ष का यह भी कहना है कि आगामी अन्नपूर्णा योजना के तहत पात्र महिला लाभार्थियों को हर महीने आर्थिक सहायता दी जाएगी, लेकिन इसके लिए वोटर पहचान अनिवार्य होगी।

इस मुद्दे पर राज्य के सामाजिक कल्याण विभाग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि पारदर्शिता और सही लाभार्थियों तक योजना पहुंचाने के लिए यह जरूरी कदम है। इसी बीच बिहार सरकार ने भी लगभग इसी मॉडल को अपनाने का संकेत दिया है। वहां के प्रशासन ने भी संकेत दिया है कि संशोधित वोटर लिस्ट के आधार पर राशन और सामाजिक योजनाओं के लाभार्थियों की समीक्षा की जाएगी। कई नाम सूची से हटाए भी जा रहे हैं। सरकार का दावा है कि इससे फर्जी लाभार्थियों पर रोक लगेगी और सरकारी योजनाओं का लाभ केवल पात्र लोगों तक पहुंचेगा।

हालांकि इस फैसले पर राजनीतिक विवाद भी तेज हो गया है। विपक्ष का आरोप है कि वोटर लिस्ट को आधार बनाकर नागरिकता और सामाजिक अधिकारों को जोड़ना गलत है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सवाल उठाते हुए कहा कि क्या नागरिकता का आधार वोटर लिस्ट है या वोटर लिस्ट ही नागरिकता का आधार बन गई है।

तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता ने भी चिंता जताते हुए कहा कि यह प्रक्रिया कहीं कमजोर और अल्पसंख्यक वर्गों को योजनाओं से बाहर करने का माध्यम न बन जाए। वहीं, भाजपा की ओर से इस फैसले का बचाव करते हुए कहा गया है कि मृत और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाना एक स्वाभाविक और आवश्यक प्रक्रिया है, ताकि सरकारी लाभ सही लोगों तक पहुंचे।

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