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वैज्ञानिकों ने खोजी दो नई मकड़ियों के प्रजातियाँ के जाले और उनके सामाजिक व्यवहार पर नई जानकारी

स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिकाओं में प्रकाशन और शोध का वैश्विक महत्व

कोहिमा : हाल ही में जूलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के जीवविज्ञानी वैज्ञानिकों ने नागालैंड में मकड़ियों की दो नई प्रजातियों की खोज की है। यह खोज देश के चार जैविक हॉटस्पॉट्स में से एक उत्तर-पूर्व भारत के इंदो-बर्मा क्षेत्र में की गई। शोधकर्ताओं ने यह मकड़ियाँ नागालैंड के एनतु और फेनशुनियू गांवों में पाए। वैज्ञानिकों ने इन्हें उनके गांवों के नाम पर पेकरस एनतु और पेकरस फेनशुनियू नाम दिया है।

ये मकड़ियाँ आर्द्र जंगलों में बड़े पैमाने पर फैलाए हुए जाले में रहती है जो चादर जैसे क्षैतिज ढांचे में बुने जाते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार इनकी शारीरिक संरचना लंबी और दबे हुए आकार की है और इनके सामने के पैर बहुत लंबे और पतले होते हैं। इससे पहले हिमालयी वन क्षेत्रों में पेकरस हिमालयानस नामक मकड़ियाँ की खोज हुई थी लेकिन नागालैंड में इसे अब तक नहीं पाया गया था।

हाल की खोज में वैज्ञानिकों ने यह भी देखा कि एक ही जाले में पेकरस हिमालयानस और पेकरस एनतु एक साथ मौजूद हैं। यह न केवल हिमालयानस की विचरण सीमा को बढ़ाता है बल्कि मकड़ियाँ के सामाजिक व्यवहार पर प्रचलित धारणाओं को भी चुनौती देता है। इस नई खोज के बाद भारत में अब पेकरस गण की कुल नौ मकड़ियों की प्रजातियां जानी गई हैं।

इसी के साथ, जेडएसआई ने भारत में भारतीय व्हिप स्कॉर्पियन्स की पहली पूर्ण श्रेणीबद्ध वैज्ञानिक पुनः मूल्यांकन की घोषणा भी की। इन व्हिप स्कॉर्पियन्स को भारत में ‘विनिगेरन’ के नाम से जाना जाता है। इनके लंबे चाबुक जैसे पूंछ होते हैं और यह दुश्मनों को भगाने के लिए सिर पर सिरका जैसे गंधयुक्त एसिड छोड़ते हैं। विश्व स्तर पर इस समूह की कुल 138 प्रजातियां पाई गई हैं। भारत में पिछले 100 वर्षो में इस समूह पर पर्याप्त शोध नहीं हुआ था।

अब जेडएसआई ने भारत में पाए जाने वाले पांच व्हिप स्कॉर्पियन्स में से चार की वैज्ञानिक पहचान और विवरण को आधुनिक आधार पर प्रकाशित किया है। यह उपलब्धि अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पत्रिका ‘जूटाक्सा’ में प्रकाशित की गई। जेडएसआई के निदेशक धृति बंद्योपाध्याय ने कहा देश के चार जैविक हॉटस्पॉट क्षेत्रों में उत्तर-पूर्व भारत का इंदो-बर्मा क्षेत्र रोज नए खोजों से हमें अपनी जैव विविधता की अद्भुतता का अहसास कराता है। शोध टीम के सदस्य सौभिक सेन ने कहा यह केवल एक नई प्रजाति की खोज नहीं है प्रत्येक खोज हमें पर्यावरण संरक्षण के प्रति हमारी जिम्मेदारी याद दिलाती है।

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