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राजस्थान में गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की उठी मांग, कुर्बानी और आस्था पर भी हुई चर्चा

मुरादाबाद से जयपुर तक गाय को लेकर बयानबाजी तेज

By प्रियंका महतो

May 28, 2026 16:41 IST

जयपुर : राजस्थान हज वेलफेयर सोसाइटी के सदस्यों ने गुरुवार को मांग की कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए। शेख हाजी निजामुद्दीन ने एएनआई से बातचीत में ईद-उल-अजहा के अवसर पर सभी को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि कुरान में भाईचारे और प्रेम पर जोर दिया गया है और देश में भाईचारे का संदेश देने के लिए गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा मैं ईद-उल-अजहा की सभी को शुभकामनाएं देता हूं। कुरान में भाईचारे और प्रेम पर जोर दिया गया है। देश की मौजूदा स्थिति को देखते हुए हम चाहते है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए ताकि देश में भाईचारे का संदेश जाए।

इससे पहले समाजवादी पार्टी के नेता एस. टी. हसन ने कहा था कि धार्मिक भावनाओं का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पारंपरिक कुर्बानी जारी रहेगी, लेकिन मुसलमानों को गाय और अन्य संरक्षित जानवरों के सेवन से बचना चाहिए। एएनआई से बातचीत में उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में कई वर्षों से सड़कों पर नमाज़ पढ़ने की प्रथा को हतोत्साहित किया गया है।

उन्होंने कहा उत्तर प्रदेश में कई वर्षों से सड़कों पर नमाज़ नहीं पढ़ी जा रही है। मुरादाबाद में लोग दो शिफ्ट में नमाज़ पढ़ते हैं। धार्मिक भावनाओं को राजनीतिक मुद्दा बनाकर देश को गुमराह नहीं किया जाना चाहिए। पारंपरिक कुर्बानी जारी रहेगी, लेकिन संरक्षित जानवरों की कुर्बानी नहीं दी जानी चाहिए।”

उन्होंने आगे कहा गाय को आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाना चाहिए। गाय का करोड़ों हिंदुओं के लिए गहरा धार्मिक महत्व है। इसी कारण हम मुसलमान गाय का सेवन नहीं करते ताकि हमारे हिंदू भाइयों की धार्मिक भावनाएं किसी भी तरह आहत न हों।

उनकी यह टिप्पणी ईद-उल-अजहा के अवसर पर मुरादाबाद में नमाज अदा करने के लिए उमड़ी भारी भीड़ के बीच आई है।इसी बीच समाजवादी पार्टी के सांसद मोहिब्बुल्लाह नदवी ने गुरुवार को ईद-उल-अजहा के अवसर पर शुभकामनाएं देते हुए इस पर्व के महत्व पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा लोग मस्जिदों में इकट्ठा होकर सभी की भलाई के लिए दुआ करते हैं। वे बलिदान की परंपरा को याद करते हैं और इबादत करते हुए कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। इस अभ्यास के माध्यम से वे इस मूल सत्य को स्वीकार करते हैं कि सभी का एक ही मालिक है और हम सभी एक ही पूर्वज से जुड़े है इसलिए हमें मानवता और न्याय के सिद्धांतों के साथ मिलकर रहना चाहिए।”

ईद-उल-अजहा या बकरीद एक महत्वपूर्ण इस्लामी पर्व है, जिसे ‘बलिदान का पर्व’ भी कहा जाता है। यह इस्लामी चंद्र कैलेंडर के 12वें महीने ज़िलहिज्जा की 10वीं तारीख को मनाया जाता है और मक्का में वार्षिक हज यात्रा के समापन का प्रतीक है।

यह पर्व हर वर्ष अलग तारीख को पड़ता है क्योंकि यह चंद्र कैलेंडर पर आधारित होता है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर से लगभग 11 दिन छोटा होता है। इसलिए हर वर्ष यह त्योहार पश्चिमी कैलेंडर में पहले की ओर खिसकता जाता है।

यह पर्व खुशी आत्मचिंतन और करुणा का प्रतीक माना जाता है, जिसमें लोग सामाजिक संबंधों को मजबूत करते है पुरानी नाराजगियों को भूलते हैं और दान व परोपकार में भाग लेते हैं। यह पैगंबर इब्राहिम की ईश्वर के प्रति आज्ञाकारिता में बलिदान की इच्छा की स्मृति में मनाया जाता है जो आस्था और समर्पण का प्रतीक है।

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