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ऑपरेशन सिंदूर से वसुधैव कुटुंबकम तक, जब पतंगों के जरिये बोली कूटनीति

इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल में राष्ट्रवाद, वैश्विक साझेदारी और सांस्कृतिक शक्ति का अनोखा प्रदर्शन।

By श्वेता सिंह

Jan 12, 2026 19:46 IST

अहमदाबाद: अहमदाबाद का आसमान सोमवार को सिर्फ रंगों से नहीं बल्कि संकेतों और संदेशों से भरा हुआ था। इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल 2026 का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने किया, लेकिन यह आयोजन केवल सांस्कृतिक उत्सव भर नहीं रहा। यह भारत की सॉफ्ट पावर, सार्वजनिक कूटनीति और राष्ट्रीय विमर्श का खुला मंच बन गया।

नीले, साफ आसमान में लहराती पतंगों पर लिखे संदेश - ‘ऑपरेशन सिंदूर’, ‘वसुधैव कुटुंबकम’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और तिरंगा- यह संकेत दे रहे थे कि परंपरा अब केवल उत्सव नहीं बल्कि संवाद का माध्यम भी बन चुकी है। पतंगों के आकार, रंग और थीम यह दर्शा रहे थे कि भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत के जरिए राजनीतिक आत्मविश्वास और वैश्विक भूमिका को कैसे प्रस्तुत कर रहा है।

सबरमती रिवरफ्रंट पर प्रधानमंत्री मोदी और चांसलर मर्ज का एक साथ खड़े होकर पतंग उड़ाना, एक प्रतीकात्मक दृश्य था। हवा के साथ तालमेल बिठाती पतंग की तरह ही भारत और जर्मनी के रिश्ते भी संतुलन, भरोसे और साझेदारी पर टिके होने का संदेश दे रहे थे। यह दृश्य मंच से दिए गए भाषणों से कहीं अधिक प्रभावी था।

जहां आसमान विचारों से भरा था, वहीं जमीन पर सांस्कृतिक संवाद की ध्वनि सुनाई दे रही थी। 108 संगीतकारों ने भारतीय शास्त्रीय वाद्य यंत्रों पर जर्मन धुनें बजाईं। यह केवल एक स्वागत कार्यक्रम नहीं, बल्कि यह दर्शाता था कि भारत वैश्विक संबंधों को स्थानीय संस्कृति के माध्यम से अपनाने की क्षमता रखता है।

इस उत्सव में भाग लेने वाले 50 देशों के 135 अंतरराष्ट्रीय पतंगबाज और भारत के विभिन्न राज्यों से आए प्रतिभागी, इस आयोजन को वास्तविक अर्थों में वैश्विक बनाते हैं। गुजरात के 16 जिलों से आए 871 पतंगबाज यह बताते हैं कि यह आयोजन केवल अंतरराष्ट्रीय नहीं, बल्कि स्थानीय भागीदारी पर आधारित वैश्विक मंच है।

1989 से उत्तरायण के अवसर पर आयोजित हो रहा यह काइट फेस्टिवल अब केवल पतंगबाजों का मंच नहीं रहा। यह भारत की उस रणनीति का हिस्सा बन चुका है, जहां संस्कृति, पर्यटन और कूटनीति एक-दूसरे के पूरक बनकर सामने आते हैं।

इस बार अहमदाबाद का आसमान यह संदेश देता नजर आया कि भारत अपनी परंपराओं को संजोते हुए उन्हें वैश्विक भाषा में बदलना जानता है। पतंगें यहां सिर्फ हवा में नहीं उड़ रहीं थीं, वे भारत की सोच, आत्मविश्वास और दुनिया से संवाद करने के तरीके को भी ऊंचाई पर ले जा रही थीं।

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