अजमेर/जयपुर: अजमेर शरीफ दरगाह को लेकर एक बार फिर कानूनी और वैचारिक बहस तेज हो गई है। अजमेर की एक जिला अदालत में दायर याचिका में दावा किया गया है कि सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह मूल रूप से एक प्राचीन शिव मंदिर थी और बाद में इसे दरगाह का स्वरूप दिया गया। इस याचिका के जरिए स्थल का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से सर्वे कराने की मांग की गई है।
यह याचिका महाराणा प्रताप सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजवर्धन सिंह परमार की ओर से दायर की गई है। परमार का कहना है कि वह लंबे समय से इस मुद्दे को उठा रहे हैं और इससे पहले इस संबंध में राष्ट्रपति को भी ज्ञापन सौंप चुके हैं, जिसे राजस्थान के मुख्य सचिव के पास भेजा गया है। उनका दावा है कि ऐतिहासिक तथ्यों की जांच के लिए ASI सर्वे जरूरी है, ताकि स्थल की वास्तविक प्रकृति सामने आ सके।
वरिष्ठ अधिवक्ता ए.पी. सिंह के अनुसार, याचिका सोमवार को अजमेर जिला न्यायाधीश की अदालत में दाखिल की गई है। याचिका में कहा गया है कि यह स्थल प्राचीन काल में भगवान शिव को समर्पित मंदिर था। अदालत अब इस मामले में प्रारंभिक सुनवाई के बाद आगे की प्रक्रिया तय करेगी।
यह मामला नया नहीं है। वर्ष 2024 में हिंदू सेना के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने भी इसी तरह की याचिका दायर कर दावा किया था कि अजमेर शरीफ दरगाह का निर्माण एक मंदिर को ध्वस्त कर किया गया और इसे हिंदू मंदिर घोषित किया जाना चाहिए। इन याचिकाओं के जरिए धार्मिक स्थलों के इतिहास और उनकी संरचना को लेकर विवाद बार-बार न्यायिक दायरे में आ रहा है।
दूसरी ओर, अजमेर शरीफ दरगाह को भारत के सबसे पवित्र मुस्लिम तीर्थस्थलों में गिना जाता है। यह न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व भी रखती है। सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती फारस से भारत आए थे और 1192 से 1236 ईस्वी तक अजमेर में रहे। उनके सम्मान में मुगल सम्राट हुमायूं ने दरगाह का निर्माण कराया था, जहां उनकी मजार स्थित है।
मुगल काल में इस दरगाह का विशेष महत्व रहा। सम्राट अकबर हर वर्ष पैदल अजमेर की यात्रा करते थे, जबकि शाहजहां सहित कई मुगल शासकों ने दरगाह परिसर में मस्जिदों और अन्य संरचनाओं का निर्माण कराया। यही कारण है कि यह स्थल केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी बेहद संवेदनशील माना जाता है।
विश्लेषकों का मानना है कि अजमेर शरीफ से जुड़ा यह विवाद उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है, जिसमें देश के कई धार्मिक स्थलों की ऐतिहासिक पहचान को लेकर कानूनी लड़ाइयां तेज हो रही हैं। ऐसे मामलों में अदालतों के सामने एक ओर ऐतिहासिक तथ्यों की जांच की चुनौती है, तो दूसरी ओर सामाजिक सौहार्द और धार्मिक भावनाओं को संतुलित रखने की जिम्मेदारी भी। आने वाले समय में यह मामला न सिर्फ कानूनी, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के लिहाज से भी अहम रहने वाला है।