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इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतें शहरी नियोजन की विफलता का नतीजा हैं: दिग्विजय सिंह

By प्रियंका कानू

Jan 11, 2026 16:48 IST

इंदौर: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने रविवार को कहा कि इंदौर में दूषित पानी पीने से हुई मौतें शहरी नियोजन की विफलता का घातक परिणाम हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए जवाबदेही तय करना जरूरी है। मीडिया से बातचीत में राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने कहा कि जब तक सीवेज और पीने के पानी की पाइपलाइनों को पूरी तरह अलग नहीं किया जाएगा, तब तक इस तरह की त्रासदियां बार-बार होती रहेंगी।

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, हाल ही में इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से फैले डायरिया प्रकोप के कारण 7 लोगों की मौत हुई। वहीं स्थानीय लोगों का दावा है कि मृतकों की संख्या 17 तक है। इंदौर जिला कलेक्टर ने इस घटना से प्रभावित 18 परिवारों को 2-2 लाख रुपये का मुआवजा दिया है। दिग्विजय सिंह ने कहा कि दूषित पानी की यह त्रासदी शहरी योजना की नाकामी का घातक नतीजा है। उन्होंने दावा किया कि इस घटना में 20 से ज़्यादा लोगों की जान गई और कहा कि दूषित पानी से गई जानें वापस नहीं लाई जा सकतीं, न ही कोई मुआवजा परिवारों के दुख को कम कर सकता है।

उन्होंने कहा कि एक काम जरूर किया जा सकता है। यह पता लगाया जाना चाहिए कि लापरवाही और भ्रष्टाचार का गंदा पानी कब और कैसे ज़िम्मेदारी, नैतिकता और जवाबदेही की स्वच्छ जल व्यवस्था में मिल गया। भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के उपायों पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि यह सिर्फ़ राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि नागरिक कर्तव्य भी है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबिलिटी की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा कि भारत का करीब 70 प्रतिशत पानी दूषित हो चुका है। उन्होंने कहा कि अगर भारत के सबसे साफ शहरों में शामिल इंदौर में दूषित पानी से मौतें हो सकती हैं, तो दूरदराज और वंचित इलाकों में होने वाली ऐसी मौतों की कल्पना करना मुश्किल नहीं है, जहां अक्सर ये मामले सामने ही नहीं आते।

दिग्विजय सिंह ने बताया कि ग्रामीण रोज़गार में कमी, पलायन और तेज शहरीकरण के दबाव के चलते सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती बन गया है। उन्होंने कहा कि इस समस्या का समाधान केवल पाइपलाइन बिछाने से नहीं होगा। अवैध बस्तियों पर नियंत्रण, सीवेज और पीने के पानी की स्पष्ट अलग व्यवस्था और हर 10 साल में नया मास्टर प्लान लागू करना बेहद जरूरी है। उन्होंने ठेकेदार-केंद्रित व्यवस्था की बजाय नागरिक-केंद्रित सिस्टम अपनाने की वकालत की और कहा कि जब तक सीवेज और पेयजल लाइनों को पूरी तरह अलग नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसी घटनाएं चेतावनी देती रहेंगी।

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