आज की तेज रफ्तार ज़िंदगी में मानसिक स्वास्थ्य एक बेहद अहम सामाजिक मुद्दा बन चुका है। काम का दबाव, रिश्तों की जटिलताएं, पारिवारिक ज़िम्मेदारियां और समाज की उम्मीदों के बीच अपनी मानसिक सेहत का खयाल रखना आज बहुत से लोगों के लिए बड़ी चुनौती है।
इसी संदर्भ में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ाने और जरूरी सहायता लोगों तक पहुंचाने का अहम काम कर रही हैं 'मनोवैज्ञानिक नम्रता भौमिक'। उनकी संस्था "मेंटल हेल्थ सोसाइटी" समाज के हर वर्ग के लोगों की मानसिक भलाई के लिए लगातार काम कर रही है। वे कई एनजीओ के साथ मिलकर जरूरतमंद बच्चों और माताओं के लिए काउंसलिंग, सहायता और जागरूकता कार्यक्रम चलाती हैं। इन पहलों का मुख्य उद्देश्य मानसिक समस्याओं को सरल भाषा में समझाना और मदद मांगने से जुड़ा डर दूर करना है।
कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट नम्रता भौमिक एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में क्लिनिकल साइकोलॉजी की असिस्टेंट प्रोफेसर, मेंटल हेल्थ सोसाइटी की संस्थापक और पीएचडी शोधार्थी भी हैं। उनका मानना है कि आर्थिक कमी के कारण किसी को भी मानसिक स्वास्थ्य इलाज से वंचित नहीं रहना चाहिए। वे मानसिक बीमारी को शारीरिक बीमारी जितनी ही गंभीरता से देखने पर ज़ोर देती हैं। नम्रता कहती हैं कि मानसिक रूप से स्वस्थ होने का मतलब यह नहीं कि ज़िंदगी में कभी तनाव न हो बल्कि तनाव के बीच भी अपनी भावनाओं को समझना, स्वीकार करना और सही तरीके से संभाल पाना ही असली ताकत है।
वे बताती हैं कि आज के समय में जीवन के हर चरण में तनाव, चिंता (एंग्ज़ायटी) और अवसाद (डिप्रेशन) आम हो गए हैं। ऐसे में भावनाओं को नियंत्रित करना और भावनात्मक सहनशीलता विकसित करना बेहद जरूरी है। भावनाओं को नियंत्रित करने का मतलब है, अपनी भावनाओं को समझना, स्वीकार करना और उन्हें स्वस्थ व संतुलित तरीके से व्यक्त करना। वहीं, भावनात्मक सहनशीलता का अर्थ है, कठिन परिस्थितियों से निकलकर फिर से मानसिक रूप से स्थिर हो पाना। यह तनाव और चिंता को कम करने में बहुत मददगार होती है।
बच्चों के लिए ये दोनों बातें मानसिक विकास की नींव रखती हैं। अगर बच्चे गुस्सा, डर या दुख को सही ढंग से व्यक्त नहीं कर पाते, तो उनमें चिंता, व्यवहार संबंधी समस्याएं और शुरुआती अवसाद भी देखा जा सकता है। मध्यम उम्र में काम का दबाव, पारिवारिक ज़िम्मेदारियां और रिश्तों के तनाव लंबे समय तक रहने वाला स्ट्रेस पैदा करते हैं, जो आगे चलकर चिंता और अवसाद में बदल सकता है। बुजुर्गों में अकेलापन, शारीरिक बीमारी और जीवन में आए बदलाव मानसिक अस्थिरता बढ़ाते हैं।
हर उम्र में मानसिक स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए जरूरी है कि लोग:
- अपनी भावनाओं के बारे में खुलकर बात करें
- स्वस्थ रिश्ते बनाए रखें
- जरूरत पड़ने पर पेशेवर मदद लेने से न हिचकें
नम्रता भौमिक ने अपने काम को संस्था के "आउटरीच प्रोग्राम" के जरिये गांवों, स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और वृद्धाश्रमों तक पहुंचाया है। वे नियमित रूप से मानसिक स्वास्थ्य पर कार्यशालाएं और चर्चा सत्र आयोजित करती हैं। समाज के हाशिए पर खड़े लोगों से लेकर मुख्यधारा तक, हर किसी के साथ खड़े होकर मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को सामने लाना ही उनकी संस्था का मुख्य उद्देश्य हैं, ताकि लोग मानसिक स्वास्थ्य को भी उतनी ही गंभीरता से लें, जितनी शारीरिक स्वास्थ्य को लेते है।