आपको गाने सुनना पसंद है। काम करते समय या फुर्सत में आप अक्सर संगीत सुनते हैं। कहीं आपने पढ़ा था कि संगीत सुनने से डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसी मस्तिष्क संबंधी बीमारियों से बचाव हो सकता है इसलिए गाना सुनना आपकी आदत बन गया। घर लौटकर रसोई में काम करते वक्त भी आप कानों में एयरपॉड्स लगाए रहते हैं लेकिन हाल ही में सोशल मीडिया पर यह दावा देखने को मिला कि ऐसा करने से ब्रेन कैंसर का खतरा हो सकता है। सवाल यह है कि क्या ब्लूटूथ एयरबड्स वाकई इतने खतरनाक हैं?
डॉक्टर क्या कहते हैं?
डॉक्टरों का कहना है कि मस्तिष्क के बेहद पास ऐसे किसी भी उपकरण को लंबे समय तक नहीं रखना चाहिए, जिससे रेडिएशन निकलता हो। ब्लूटूथ एयरपॉड्स और इसी तरह के डिवाइस से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन निकलता है और इसी वजह से लोगों में डर बना हुआ है। न्यूरोसर्जन डॉ. जय जगन्नाथन कहते हैं कि एयरपॉड्स मस्तिष्क के लिए किसी मिनी माइक्रोवेव की तरह होते हैं और मोबाइल फोन से 11 गुना ज़्यादा नुकसानदायक हैं। हालांकि एयरपॉड्स या ब्लूटूथ हेडसेट्स और कैंसर के बीच सीधे संबंध को साबित करने वाला कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण अब तक नहीं मिला है।
EMF यानी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड क्या है?
EMF वह ऊर्जा है, जो किसी भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के आसपास बनती है। यह दो प्रकार की होती है:
नॉन-आयोनाइज़िंग रेडिएशन:
यह कम फ़्रीक्वेंसी वाली रेडिएशन होती है, जो आमतौर पर नुकसानदेह नहीं मानी जाती। मोबाइल फोन, ब्लूटूथ डिवाइस और वाई-फाई राउटर से इसी तरह की रेडिएशन निकलती है। यह इतनी कमज़ोर होती है कि शरीर की कोशिकाओं में मौजूद इलेक्ट्रॉन्स को अलग नहीं कर पाती इसलिए इससे आयोनाइज़ेशन नहीं होता और नुकसान की संभावना भी कम रहती है।
आयोनाइज़िंग रेडिएशन:
यह बहुत शक्तिशाली रेडिएशन होती है, जैसे एक्स-रे और गामा-रे। यह कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुंचा सकती है और कैंसर का खतरा बढ़ा सकती है।
वैज्ञानिक शोध क्या कहते हैं?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, पिछले 20 वर्षों में इस विषय पर कई अध्ययन किए गए हैं लेकिन मोबाइल फोन या एयरपॉड्स के इस्तेमाल से स्वास्थ्य जोखिम बढ़ने का कोई ठोस सबूत अब तक सामने नहीं आया है। नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (एनसीआई) के कुछ अध्ययनों में ब्रेन ट्यूमर के संकेत जरूर मिले हैं लेकिन उन शोधों में कई सीमाएं थीं। कुल मिलाकर मोबाइल फोन या ब्लूटूथ डिवाइस और कैंसर के बीच कोई सीधा संबंध साबित नहीं हुआ है। इन डिवाइस से निकलने वाली रेडिएशन की मात्रा अंतरराष्ट्रीय मानकों से काफी कम होती है इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि इनका इस्तेमाल आमतौर पर सुरक्षित माना जा सकता है।