कई डायलिसिस मरीज़ों के लिए यह पूरी प्रक्रिया बहुत उलझन भरी और डरावनी लग सकती है क्योंकि इसे हमेशा साफ तरीके से समझाया नहीं जाता। कई बार खुद मरीज भी स्टेप्स ठीक से याद नहीं रख पाते। डॉक्टर समझाने की पूरी कोशिश करते हैं, फिर भी शुरुआती मरीज आधी बातें भूल जाते हैं, स्टेप्स गड़बड़ा देते हैं या पड़ोसियों से सुनी गलत बातों पर भरोसा कर लेते हैं। इसी वजह से डायलिसिस जरूरत से ज़्यादा तनावपूर्ण बन जाता है। भारत के कई हिस्सों में लोग आज भी मुंह-जबानी बातों पर निर्भर रहते हैं, जिससे गलतफहमियां और बढ़ जाती हैं।
डायलिसिस की ज़रूरत क्यों पड़ती है
किडनी का काम खून से गंदे और हानिकारक पदार्थों को बाहर निकालना होता है। जब किडनी ठीक से काम करना बंद कर देती है या बहुत कम काम करती है, तो ये जहरीले पदार्थ शरीर में जमा होने लगते हैं। इससे सूजन, उल्टी, भारीपन, सांस लेने में दिक्कत जैसी समस्याएँ होती हैं, जो जल्दी गंभीर हो सकती हैं। डायलिसिस किडनी की बीमारी को ठीक नहीं करता, बल्कि एक अस्थायी कृत्रिम किडनी की तरह काम करता है। कई मरीज गलत समझते हैं कि डायलिसिस से किडनी ठीक हो जाएगी लेकिन ऐसा नहीं है। डायलिसिस किडनी का विकल्प बनकर शरीर को संतुलित रखने में मदद करता है।
स्टेप 1: डायलिसिस से पहले जांच और तैयारी
जब मरीज़ डायलिसिस यूनिट में पहुंचता है, तो स्टाफ उसका ब्लड प्रेशर, वजन, सूजन और लक्षणों की जांच करता है और कुछ सामान्य सवाल पूछता है। कई नए मरीज सोचते हैं कि यह सिर्फ़ औपचारिकता है, लेकिन यह बहुत ज़रूरी होता है क्योंकि इसी से तय होता है कि मशीन शरीर से कितना पानी निकालेगी। अगर मरीज कमजोरी या चक्कर जैसी बातें नहीं बताता, तो मशीन की सेटिंग गलत हो सकती है। कुछ लोग ज़्यादा पानी पीकर आते हैं, यह सोचकर कि कोई फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन इससे डायलिसिस के दौरान ज़्यादा पानी निकालना पड़ता है और ऐंठन हो सकती है।
स्टेप 2: एक्सेस वाली जगह की सफाई और तैयारी
डायलिसिस के लिए शरीर में एक खास एक्सेस होता है — फिस्टुला, ग्राफ्ट या कैथेटर। कई मरीज़ों को इनके फर्क की जानकारी नहीं होती और वे सोचते हैं कि सभी एक्सेस एक जैसे होते हैं। नर्स उस जगह को बहुत सावधानी से साफ करती है लेकिन कई बार मरीज घबराकर हाथ ज़्यादा हिलाते हैं, जिससे प्रक्रिया में देरी होती है। मशीन की ट्यूब में हवा निकालने के लिए उन्हें पहले भरा जाता है। शुरुआती मरीज ट्यूब में खून देखकर घबरा जाते हैं लेकिन यह पूरी तरह सामान्य और सुरक्षित होता है और हर डायलिसिस में होता है।
स्टेप 3: मशीन से जोड़ना
नर्स दो सुई लगाती है (फिस्टुला या ग्राफ्ट में) या कैथेटर की लाइन जोड़ती है। एक सुई खून मशीन तक ले जाती है और दूसरी सुई साफ़ किया हुआ खून वापस शरीर में भेजती है कई नए मरीज़ सोचते हैं कि मशीन खून को कहीं जमा कर लेती है या बहुत ज़्यादा खून निकाल लेती है, जबकि असल में खून लगातार घूमता रहता है। सुई लगने पर हल्की चुभन या दबाव महसूस हो सकता है, लेकिन कुछ सत्रों के बाद इसकी आदत हो जाती है।
स्टेप 4: खून की सफ़ाई शुरू होती है
अब मशीन खून से ज़हरीले तत्व निकालती है, नमक और मिनरल का संतुलन ठीक करती है और शरीर से अतिरिक्त पानी निकालती है। कुछ लोगों को ठंड लग सकती है, थकान या हल्का सिरदर्द हो सकता है, जबकि कुछ को कुछ भी महसूस नहीं होता। कई नए मरीज मशीन की बीप या चमकती लाइट देखकर डर जाते हैं और सोचते हैं कि कोई बड़ी समस्या हो गई है, जबकि ज़्यादातर बार यह सिर्फ सामान्य अलर्ट होता है। शुरुआती सत्रों में ऐंठन, बीपी गिरना या मुंह सूखना आम बात है लेकिन नए मरीज़ इससे डर जाते हैं।
स्टेप 5: डायलिसिस के दौरान लगातार निगरानी
एक डायलिसिस सत्र आमतौर पर 3 से 4 घंटे चलता है। कई नए मरीज़ बार-बार नर्स से पूछते रहते हैं कि कब खत्म होगा क्योंकि उन्हें बेचैनी या बोरियत महसूस होती है। नर्स लगातार बीपी, लक्षण और मशीन की रीडिंग चेक करती रहती है और ज़रूरत पड़ने पर सेटिंग बदलती है। कुछ मरीज़ हल्की परेशानी होने पर भी नर्स को नहीं बताते क्योंकि उन्हें डर होता है कि नर्स डाँट देंगी। इससे समस्या और बढ़ सकती है। हल्की ऐंठन या मतली भी हो तो बताना जरूरी है लेकिन नए मरीज अक्सर इसे छुपा लेते हैं।
स्टेप 6: डायलिसिस के बाद मशीन से हटाना
जब तय मात्रा में पानी निकल जाता है, तो मशीन की गति धीमी कर दी जाती है। नर्स सुई या कैथेटर की लाइन हटाती है और खून रोकने के लिए उस जगह दबाव देती है। कई मरीज तुरंत खड़े हो जाते हैं, जिससे चक्कर आता है, और वे इसे डायलिसिस की कमजोरी समझ लेते हैं, जबकि धीरे उठने से ऐसा नहीं होता। कुछ लोग बहुत ज़्यादा प्यास लगने पर तुरंत ढेर सारा पानी पी लेते हैं, जिससे अगली डायलिसिस में दिक्कत होती है।
स्टेप 7: डायलिसिस के बाद जांच
डायलिसिस के बाद फिर से वजन लिया जाता है ताकि यह देखा जा सके कि कितना पानी निकाला गया। अगर वजन में बड़ा फर्क आता है, तो इसका मतलब हो सकता है कि मरीज़ ने पहले ज़्यादा पानी पी लिया था या सही जानकारी नहीं दी थी। डायलिसिस के बाद खाना, पानी, नमक और दवाइयों का सही ध्यान रखना लंबे समय में बहुत मदद करता है।
नए मरीज़ों की आम गलतफहमियां
वीएमपीएल की रिपोर्ट के अनुसार कई नए मरीज सोचते हैं कि डायलिसिस बहुत दर्दनाक होता है, जबकि ज़्यादातर समय ऐसा नहीं होता, सिर्फ सुई लगने पर थोड़ी तकलीफ होती है। कुछ लोग मानते हैं कि डायलिसिस से किडनी और खराब हो जाती है या उम्र कम हो जाती है, जबकि असल में डायलिसिस ही मरीज़ को स्थिर रखता है। अधिकतर भ्रम अफवाहों, व्हाट्सएप फॉरवर्ड या ज़्यादा डरने की वजह से होता है। NephroPlus जैसे हेल्थकेयर ग्रुप मरीज़ों को सही जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन नए मरीज़ों को भी खुलकर सवाल पूछने चाहिए।