तेजपुर: असम के तेजपुर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने रक्त में ऐसे विशिष्ट रासायनिक संकेत (केमिकल सिग्नेचर) की पहचान की है, जिनकी मदद से पित्ताशय (गॉलब्लैडर) कैंसर के उन मामलों में अंतर किया जा सकता है जो पित्त की पथरी (गॉलस्टोन) के साथ होते हैं और जो बिना पथरी के होते हैं। यह खोज इस अत्यंत आक्रामक और अक्सर देर से पकड़ में आने वाले कैंसर की शुरुआती पहचान में मददगार साबित हो सकती है। एक बयान के अनुसार, इस शोध में रक्त-आधारित ‘मेटाबॉलिक सिग्नेचर’ की पहचान की गई है, जो गॉलब्लैडर कैंसर के संभावित बायोमार्कर के रूप में काम कर सकते हैं।
गॉलब्लैडर कैंसर जठरांत्र (गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल) तंत्र के सबसे घातक कैंसरों में शामिल है और पूर्वोत्तर भारत में इसकी घटनाएं असमान रूप से अधिक हैं, जहां यह तीसरा सबसे आम कैंसर है। यह बीमारी अपनी ‘खामोश प्रगति’ के लिए कुख्यात है, जिसमें अधिकांश मरीज उन्नत अवस्था में पहुंचने के बाद ही अस्पताल आते हैं, जब इलाज के विकल्प बेहद सीमित रह जाते हैं। हालांकि पित्त की पथरी को एक प्रमुख जोखिम कारक माना जाता है लेकिन सभी पथरी वाले मरीजों में कैंसर नहीं होता। वहीं, बड़ी संख्या में ऐसे मरीज भी पाए जाते हैं, जिनमें बिना किसी पथरी के गॉलब्लैडर कैंसर का पता चलता है।
असम में गॉलब्लैडर कैंसर का बोझ भविष्य में और बढ़ने का अनुमान है, जिससे शुरुआती पहचान की रणनीतियों की तत्काल आवश्यकता और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, विश्वविद्यालय के आणविक जीवविज्ञान एवं जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सहायक प्रोफेसर पंकज बराह और शोधार्थी चिन्मयी बरुआ के नेतृत्व में किया गया यह अध्ययन अमेरिकन केमिकल सोसाइटी की जर्नल ऑफ प्रोटीओम रिसर्च में प्रकाशित हुआ है। पंकज बराह ने कहा कि हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि रक्त में क्रिएटिनिन से जुड़े रासायनिक मेटाबोलाइट्स में होने वाले बदलाव गॉलब्लैडर कैंसर के उन मामलों में स्पष्ट अंतर दिखाते हैं, जो पथरी के साथ होते हैं और जो बिना पथरी के होते हैं। इससे सरल रक्त परीक्षण विकसित करने की संभावना बनती है, जो शुरुआती पहचान में मदद कर सकते हैं।
उन्नत मेटाबोलोमिक्स तकनीकों का उपयोग करते हुए शोधकर्ताओं ने सैकड़ों बदले हुए मेटाबोलाइट्स की पहचान की—बिना पथरी वाले कैंसर मामलों में 180 और पथरी से जुड़े मामलों में 225। प्रत्येक प्रकार के लिए उच्च नैदानिक सटीकता वाले अलग-अलग बायोमार्कर पैनल की पहचान की गई, जिनमें कई बाइल एसिड और अमीनो एसिड डेरिवेटिव शामिल हैं, जो ट्यूमर की प्रगति से जुड़े होते हैं।
यह शोध एक बहु-विषयक सहयोग के तहत किया गया, जिसमें सर्जन, पैथोलॉजिस्ट, फार्मास्युटिकल वैज्ञानिक, आणविक जीवविज्ञानी और कम्प्यूटेशनल वैज्ञानिक शामिल थे। क्लिनिकल सहयोग असम मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, डिब्रूगढ़; डॉ. बी. बरूआ कैंसर संस्थान, गुवाहाटी; और स्वागतम सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल से प्राप्त हुआ। वहीं विश्लेषणात्मक और कम्प्यूटेशनल सहयोग अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉय, अर्बाना–शैम्पेन और सीएसआईआर–भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान, लखनऊ द्वारा प्रदान किया गया। असम मेडिकल कॉलेज की पैथोलॉजिस्ट गायत्री गोगोई ने शोध की व्यावहारिक उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि टिशू पैथोलॉजी को रक्त मेटाबोलोमिक्स से जोड़कर यह शोध प्रयोगशाला की खोजों और क्लिनिकल निदान के बीच की दूरी को पाटता है।
गुवाहाटी स्थित प्रसिद्ध गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सर्जन सुभाष खन्ना ने इस खोज को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि रक्त-आधारित मेटाबॉलिक मार्करों की पहचान शुरुआती निदान और बेहतर क्लिनिकल निर्णय लेने की दिशा में एक व्यावहारिक रास्ता प्रदान करती है। हालांकि शोधकर्ता यह भी स्पष्ट करते हैं कि क्लिनिकल उपयोग से पहले बड़े और बहु-केंद्रित अध्ययनों की आवश्यकता होगी लेकिन यह अध्ययन विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत जैसे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों के लिए गैर-आक्रामक (नॉन-इनवेसिव) स्क्रीनिंग टूल विकसित करने की एक मजबूत वैज्ञानिक नींव प्रदान करता है।