रांची : दुष्कर्म पीड़िताओं और उनके परिवारों को अनेक मामलों में सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। इसी वास्तविकता को रेखांकित करते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने दुष्कर्म की घटनाओं तथा पीड़िताओं के प्रति समाज और प्रशासन के दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता पर बल देते हुए कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं।
न्यायमूर्ति एम. एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने अपने अवलोकन में कहा कि अक्सर दुष्कर्म पीड़िता को ही अपमान और सामाजिक तिरस्कार झेलना पड़ता है। कई बार पीड़िता और उसके परिजनों का सामाजिक बहिष्कार किया जाता है, जिसके कारण उन्हें गंभीर मानसिक आघात के साथ-साथ सम्मानजनक जीवन बनाए रखने में भी भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
अदालत ने कहा कि समाज को अधिक संवेदनशील बनाने के लिए निरंतर जागरूकता और सामाजिक पहल आवश्यक हैं। साथ ही प्रशासन को भी यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निभानी होगी कि पीड़िता और उसके परिवार को किसी प्रकार की प्रताड़ना या उत्पीड़न का सामना न करना पड़े।
खंडपीठ ने दुष्कर्म की जांच के दौरान लंबे समय से प्रचलित ‘टू-फिंगर टेस्ट’ को भी एक प्रकार की प्रताड़ना माना है। अदालत ने निर्देश दिया कि सरकारी और निजी, सभी अस्पतालों में इस प्रक्रिया को तत्काल और स्थायी रूप से बंद किया जाए। आदेश का उल्लंघन होने पर संबंधित चिकित्सकों और अधिकारियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस आदेश के बाद वर्ष 2014 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी इस संबंधी दिशा-निर्देशों को झारखंड में कानूनी रूप से बाध्यकारी स्वरूप मिल गया है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दुष्कर्म के मामलों में ‘जीरो एफआईआर’ दर्ज करना अनिवार्य है। इसका अर्थ है कि घटना किसी भी स्थान पर हुई हो, कोई भी महिला किसी भी थाने में दुष्कर्म की शिकायत दर्ज करा सकती है। शिकायत प्राप्त करने वाले थाने की जिम्मेदारी होगी कि वह मामला संबंधित क्षेत्राधिकार वाले थाने को भेजे।
अदालत ने निर्देश दिया कि पीड़िता का बयान उप-निरीक्षक (सब-इंस्पेक्टर) स्तर की महिला अधिकारी द्वारा दर्ज किया जाए। बयान दर्ज करने की पूरी प्रक्रिया अत्यंत संवेदनशील, सम्मानजनक और भयमुक्त वातावरण में संपन्न होनी चाहिए। साथ ही बिना किसी देरी के साक्ष्य एकत्र किए जाएं और मामले का शीघ्र निपटारा सुनिश्चित किया जाए।
पीड़िता और उसके परिवार की सुरक्षा तथा पुनर्वास को भी अदालत ने विशेष महत्व दिया है। इसके लिए जांच अधिकारियों को उपयुक्त प्रशिक्षण देने का निर्देश जारी किया गया है। राज्य पुलिस महानिदेशक को संबोधित आदेश में हाईकोर्ट ने कहा है कि दुष्कर्म के किसी भी मामले की प्रारंभिक जांच 15 दिनों के भीतर पूरी की जानी चाहिए, जबकि 60 दिनों के भीतर संपूर्ण जांच समाप्त कर आरोप-पत्र (चार्जशीट) अदालत में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि जहां नाबालिग दुष्कर्म पीड़िताओं के लिए सरकारी आश्रय गृह उपलब्ध हैं, वहीं वयस्क पीड़िताओं के लिए ऐसी व्यवस्था का अभाव चिंताजनक है। इस पर असंतोष व्यक्त करते हुए हाईकोर्ट ने वयस्क पीड़िताओं के लिए भी उपयुक्त आश्रय गृह स्थापित करने की आवश्यकता बताई।
इसके अतिरिक्त अदालत ने निर्देश दिया कि दुष्कर्म पीड़िताओं तथा उनकी संतानों को कक्षा 12 तक निःशुल्क शिक्षा और छात्रवृत्ति उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी राज्य सरकार उठाए। इस योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रत्येक जिले में एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने स्कूलों और कॉलेजों में छात्राओं के लिए आत्मरक्षा प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विस्तार करने का भी निर्देश दिया है, ताकि महिलाओं और बालिकाओं की सुरक्षा तथा आत्मविश्वास को सुदृढ़ किया जा सके।