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एशियाई खेलों में बंगाल का स्वर्णिम इतिहास, 20वें एशियाई खेलों में भी बंगाल के खिलाड़ियों से बड़ी उम्मीदें

1951 एशियाड में शचीन नाग ने दिलाया था भारत को पहला स्वर्ण।

कोलकाता : जापान के आइची-नागोया में आगामी सितंबर-अक्टूबर में 20वें एशियाई खेलों का आयोजन होने जा रहा है। ओलंपिक में भले ही बंगाल के खिलाड़ियों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली हो, लेकिन एशियाई खेलों के इतिहास में बंगाल के खिलाड़ियों ने भारत के लिए कई स्वर्ण पदक जीतकर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। 1951 से लेकर 2023 तक आयोजित 19 एशियाई खेलों में भारतीय दल की उपलब्धियों में बंगाल के खिलाड़ियों का योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा है।

भारत में पहली बार 1951 में नई दिल्ली में एशियाई खेलों का आयोजन हुआ था। देश की आजादी के मात्र तीन वर्ष बाद आयोजित इस प्रतियोगिता में भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाने वाले खिलाड़ी बंगाल के ही थे। हावड़ा के शिवपुर स्थित बेनी मित्र लेन के निवासी शचीन नाग ने 100 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया था। इसके अलावा उन्होंने दो कांस्य पदक भी अपने नाम किए थे। उल्लेखनीय है कि उस प्रतियोगिता के 75 वर्ष बाद भी भारत तैराकी में दोबारा स्वर्ण पदक हासिल नहीं कर सका है। यही कारण है कि भारतीय खेल इतिहास में शचीन नाग का नाम आज भी विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है।

1951 से 2023 तक भारत ने एशियाई खेलों में कुल 183 स्वर्ण पदक जीते हैं, जिनमें बंगाल के खिलाड़ियों की भूमिका अत्यंत अहम रही है। वर्ष 2022 में चीन के हांगझोउ में होने वाले एशियाई खेल कोविड-19 महामारी के कारण एक वर्ष स्थगित होकर 2023 में आयोजित हुए। वहां भी कोलकाता के युवा खिलाड़ी अनुश अग्रवाला ने शानदार प्रदर्शन करते हुए इक्वेस्ट्रियन टीम ड्रेसेज स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता। इसके अलावा उन्होंने व्यक्तिगत स्पर्धा में कांस्य पदक भी हासिल किया। उस एशियाड में बंगाल से किसी अन्य खिलाड़ी ने दो पदक नहीं जीते थे। आगामी एशियाई खेलों में भी अनुश अग्रवाला को भारत की बड़ी पदक उम्मीदों में गिना जा रहा है।

हांगझोउ एशियाड में सफलता के एक वर्ष के भीतर अनुश अग्रवाला को भारत सरकार के युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय द्वारा प्रतिष्ठित अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दूसरी ओर, भारत को एशियाई खेलों में पहला स्वर्ण दिलाने वाले शचीन नाग को अपने जीवनकाल में कोई सरकारी सम्मान नहीं मिल पाया था। उनके पुत्र अशोक नाग के अनुसार, 1951 एशियाई खेलों में तीन पदक जीतने के बाद आयोजकों ने उनके पिता को मात्र 30 रुपये देकर ट्रेन से कोलकाता लौटने को कहा था। इस व्यवहार से आहत होकर शचीन नाग ने वह राशि लेने से इनकार कर दिया और अपने खर्च पर घर लौटे। वर्ष 2020 में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत ध्यानचंद पुरस्कार प्रदान किया।

1951 के एशियाई खेलों में भारतीय फुटबॉल टीम ने भी स्वर्ण पदक जीता था। उस स्वर्णिम टीम में बंगाल के दिग्गज खिलाड़ी शैलेन मान्ना, संतोष नंदी, सुनील चट्टोपाध्याय और अभय घोष शामिल थे। इसी प्रतियोगिता में पुरुष वाटर पोलो टीम ने भी स्वर्ण पदक जीता था, जिसमें बंगाल के गणेश घोष टीम का हिस्सा थे।

1954 में मनीला में आयोजित एशियाई खेलों में भारत ने पांच स्वर्ण पदक जीते, लेकिन उनमें कोई भी बंगाली खिलाड़ी शामिल नहीं था। 1958 में टोक्यो एशियाड में भी स्थिति लगभग समान रही। उस प्रतियोगिता के नायक महान धावक मिल्खा सिंह बने थे, जिन्होंने दो स्वर्ण पदक जीते थे।

1962 में जकार्ता एशियाड में भारतीय फुटबॉल टीम ने एक बार फिर स्वर्ण पदक हासिल किया। इस सफलता में बंगाल के खिलाड़ियों प्रद्योत बर्मन, प्रदीप कुमार बनर्जी, चुनी गोस्वामी, प्रशांत सिन्हा और अरुण घोष की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

एशियाई खेलों में बंगाल की महिला खिलाड़ियों में सबसे बड़ी उपलब्धि एथलीट ज्योतिर्मयी सिकदर के नाम दर्ज है। उन्होंने 1998 के बैंकॉक एशियाई खेलों में 800 मीटर और 1500 मीटर दौड़ में दो स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा था। उनकी इस उपलब्धि ने बंगाल और पूरे देश का गौरव बढ़ाया।

इसके बाद भी कई बंगाली खिलाड़ियों ने एशियाई खेलों में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतकर राष्ट्रीय गान के बीच पोडियम पर खड़े होने का गौरव प्राप्त किया। इनमें अंजार अली (1990, कबड्डी), विश्वजीत पालित (1994 और 1998, कबड्डी टीम), लिएंडर पेस (1994, 2002 और 2006, टेनिस युगल), जीशान अली (1994, टेनिस टीम), सोमा विश्वास (2002, रिले टीम), सौरव घोषाल (2014, स्क्वैश टीम), स्वप्ना बर्मन (2018, हेप्टाथलॉन), तथा प्रणब वर्शन और शिवनाथ सरकार (2018, ब्रिज) प्रमुख हैं।

अब एक बार फिर नजरें जापान में होने वाले आगामी एशियाई खेलों पर टिकी हैं। सितंबर में शुरू होने वाली इस प्रतियोगिता के लिए बंगाल के कई खिलाड़ी तैयारी में जुटे हुए हैं और उनसे भारत को एक बार फिर पदक जीतने की उम्मीद है। बंगाल की खेल परंपरा और एशियाई खेलों में उसकी गौरवशाली विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अब नई पीढ़ी के खिलाड़ियों के कंधों पर होगी।

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