पश्चिम बंगाल का चुनावी इतिहास 1952 से शुरू होता है, जब आजादी के बाद राज्य में पहली बार विधानसभा चुनाव कराए गए। यह उस समय की राजनीतिक यात्रा की शुरुआत थी, जो आगे चलकर विचारधाराओं और नेतृत्व के कई चरणों से गुजरी।
पहले चुनाव में नए संविधान के तहत हुए इस मतदान में तत्कालीन प्रभावशाली दल राष्ट्रीय कांग्रेस ने बड़ी जीत हासिल की और 238 में से 150 सीटें जीतीं। वहीं कम्यूनिस्ट पार्टी 28 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। आजादी के बाद के शुरुआती वर्षों में राज्य का नेतृत्व विधान चंद्र राय जैसे नेताओं के हाथों में था, जिन्होंने विभाजन के बाद पुनर्वास और औद्योगिक विकास पर जोर दिया।
लेकिन 1960 के दशक के मध्य तक आते-आते राज्य की राजनीति अस्थिर हो गई जिसका कारण खाद्य संकट और श्रमिक आंदोलनों जैसी समस्याएं थीं।
कांग्रेस के प्रभुत्व से लेकर वाम मोर्चे का सुदृढ़ीकरण
हालांकि 1960 के दशक में बदलाव की शुरुआत हुई जब वामपंथी दल कुछ समय के लिए विभिन्न गठबंधन सरकारों का हिस्सा बने। यह दौर कई सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित था, जिनमें मजबूत श्रमिक आंदोलन और समाजवादी विचारधाराओं की बढ़ती स्वीकार्यता शामिल थी।
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1977 में CPI(M) के नेतृत्व वाला वामफ्रंट सत्ता में आयी और यह दुनिया की सबसे लंबे समय तक निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकारों में से एक बनी। इस गठबंधन ने पश्चिम बंगाल पर तीन दशकों से अधिक समय तक शासन किया और राज्य के ग्रामीण ढांचे तथा प्रशासनिक व्यवस्था में बड़े बदलाव किए।
इस अवधि की प्रमुख नीतियों में ‘ऑपरेशन बर्गा’ शामिल था, जिसने बटईदार किसानों को भूमि अधिकार दिलाए और ग्रामीण बंगाल में वामपंथी आधार को मजबूत किया। पार्टी की मजबूत जमीनी संगठनात्मक संरचना ने लंबे समय तक उसकी चुनावी सफलता को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई।
वामफ्रंट को अस्वीकार करना और ममता बनर्जी का उदय
2000 के शुरुआती वर्षों तक आते-आते वाम मोर्चा को बढ़ते जन-विरोध का सामना करना पड़ा। तेजी से औद्योगिकीकरण के प्रयासों के तहत भूमि अधिग्रहण की कोशिशों ने सिंगुर और नंदीग्राम में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन को जन्म दिया। इन आंदोलनों ने वाम मोर्चे की सार्वजनिक छवि को काफी नुकसान पहुंचाया।
इन घटनाक्रमों ने ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक जमीन तैयार की, जिन्होंने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की। उन्होंने खुद को वाम शासन के प्रमुख विकल्प के रूप में स्थापित किया और ग्रामीण तथा शहरी मतदाताओं का एक व्यापक गठबंधन तैयार किया।
2011 में उनकी पार्टी ने वामफ्रंट को पराजित कर 34 वर्षों के वाम शासन का अंत किया जो बंगाल की राजनीति में एक बड़ा बदलाव माना गया।
वर्तमान समय में पश्चिम बंगाल की राजनीति मुख्य रूप से तृणमूल के नियंत्रण में है जिसका नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं। पार्टी ने 2016 और 2021 के विधानसभा चुनावों में भी लगातार जीत हासिल की।
दूसरी ओर भाजपा राष्ट्रीय पार्टी होने के साथ ही अब बंगाल में भी अपनी जगह बना रही है। इसने खुद को मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में स्थापित कर किया है, जिससे CPI(M) और कांग्रेस दोनों का प्रभाव काफी हद तक कम हुआ है। इस बदलाव ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक द्विध्रुवीय प्रतिस्पर्धा का स्वरूप दे दिया है।
पश्चिम बंगाल की वर्तमान राजनीतिक स्थिति अब भी अपने अतीत से प्रभावित है, जिसकी शुरुआत 1952 में हुए पहले विधानसभा चुनाव से मानी जाती है।