लखनऊ (उत्तर प्रदेश) : लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बुधवार को कहा कि विधायिकाओं को अधिक प्रभावी, जनोन्मुखी और जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से एक ‘राष्ट्रीय विधायी सूचकांक’ तैयार किया जाएगा।
उत्तर प्रदेश विधान भवन, लखनऊ में आयोजित 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (AIPOC) के समापन संबोधन में उन्होंने यह भी कहा कि राज्य विधायिकाओं में प्रति वर्ष कम से कम 30 बैठकें सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि विधायिकाएँ जनता की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के लिए एक प्रभावी मंच बन सकें।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय विधायी सूचकांक से देशभर की विधायिकाओं के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलेगा तथा संवाद की गुणवत्ता और कार्यकुशलता में सुधार होगा। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि इस संबंध में एक समिति का गठन किया गया है। लोकसभा अध्यक्ष के समापन संबोधन के साथ ही AIPOC का सफलतापूर्वक समापन हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने भी सम्मेलन को संबोधित किया।
अपने संबोधन में ओम बिरला ने दोहराया कि राष्ट्रीय विधायी सूचकांक न केवल विधायिकाओं के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देगा, बल्कि देशभर की विधायिकाओं में संवाद और दक्षता की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाएगा। जितना अधिक सदन काम करेगा, उतनी ही सार्थक, गंभीर और परिणामोन्मुखी चर्चाएँ संभव होंगी।
लोकसभा अध्यक्ष ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को भी संबोधित किया। आगामी बजट सत्र के दौरान कार्यवाही के सुचारु संचालन से जुड़े एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि सदन में योजनाबद्ध और लगातार व्यवधान तथा बाधाएँ देश के लोकतंत्र के लिए उचित नहीं हैं। जब सदन में व्यवधान होता है तो उसका सबसे बड़ा नुकसान नागरिकों को होता है। हमें व्यवधान की नहीं, बल्कि चर्चा और संवाद की संस्कृति को मजबूत करना चाहिए।
उन्होंने सभी राजनीतिक दलों के नेताओं और सदस्यों से सदन के सुचारु संचालन में सहयोग की अपील की और कहा कि लोकतंत्र में “जनता सर्वोच्च है और जनता के प्रति हमारी जवाबदेही केवल चुनावों के समय ही नहीं, बल्कि हर दिन और हर क्षण है।”
बिरला ने कहा कि पीठासीन अधिकारी केवल कार्यवाही संचालित करने वाले नहीं होते, बल्कि वे संविधान के प्रहरी और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के संरक्षक होते हैं। उनकी निष्पक्षता, संवेदनशीलता और दृढ़ता ही सदन की दिशा तय करती है। 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में छह प्रस्ताव पारित किए गए। एक विज्ञप्ति के अनुसार पहले प्रस्ताव में सभी पीठासीन अधिकारियों से अपने-अपने सदनों की कार्यवाही के संचालन के प्रति पुनः समर्पित होने का आह्वान किया गया, ताकि वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके।
दूसरे प्रस्ताव में कहा गया कि सभी राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाकर राज्य विधायिकाओं में प्रति वर्ष कम से कम 30 बैठकें आयोजित की जाएँ और विधायी कार्य के लिए उपलब्ध समय और संसाधनों का रचनात्मक व प्रभावी उपयोग किया जाए, ताकि लोकतांत्रिक संस्थाएँ जनता के प्रति जवाबदेह बनी रहें।
तीसरे प्रस्ताव में विधायी कार्य को सरल और प्रभावी बनाने के लिए तकनीक के उपयोग को निरंतर सशक्त करने पर ज़ोर दिया गया ताकि जनता और विधायिकाओं के बीच प्रभावी सहभागिता और सार्थक भागीदारी सुनिश्चित हो सके। चौथे प्रस्ताव में सहभागी शासन की सभी संस्थाओं को उदाहरणीय नेतृत्व प्रदान करते रहने की बात कही गई, ताकि देश की लोकतांत्रिक परंपराएँ और मूल्य और अधिक सुदृढ़ हों।
पाँचवें प्रस्ताव में संसद सदस्यों और विधान सभा सदस्यों की क्षमता निर्माण को निरंतर समर्थन देने, डिजिटल तकनीक के प्रभावी उपयोग को बढ़ावा देने तथा शोध और विश्लेषणात्मक सहयोग को मजबूत करने का आह्वान किया गया। छठे प्रस्ताव में वस्तुनिष्ठ मानकों के आधार पर विधायी निकायों के प्रदर्शन के मूल्यांकन और तुलनात्मक आकलनके लिए राष्ट्रीय विधायी सूचकांक बनाने की बात कही गई, ताकि सार्वजनिक हित में अधिक जवाबदेही के साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का वातावरण तैयार हो सके।
देश के 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से 36 पीठासीन अधिकारियों ने सम्मेलन में भाग लिया। भागीदारी के लिहाज़ से यह अब तक का सबसे बड़ा AIPOC सम्मेलन रहा। यह सम्मेलन संसद के बजट सत्र से कुछ दिन पहले आयोजित किया गया था, जो 28 जनवरी से शुरू होगा। केंद्रीय बजट 1 फरवरी को प्रस्तुत किया जाएगा।