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समानता के नाम पर असमानता? यूजीसी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट का स्टे

जनरल कैटेगरी छात्रों की आपत्तियों के बीच सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप। जातिगत भेदभाव की परिभाषा पर सवाल, अगली सुनवाई 19 मार्च को।

By श्वेता सिंह

Jan 29, 2026 23:55 IST

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता से जुड़े विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के 2026 इक्विटी रेगुलेशंस पर गुरुवार को रोक लगा दी। शीर्ष अदालत ने इन नियमों को पूरी तरह स्थगित करते हुए कहा कि इनमें ‘जाति आधारित भेदभाव’ की परिभाषा अस्पष्ट है और यह सीमित दायरे में रखी गई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक 2026 के नियमों की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक 2012 के यूजीसी नियम लागू रहेंगे। इस मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।

अदालत के समक्ष दायर याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि नए नियम मनमाने, भेदभावपूर्ण और संविधान व यूजीसी अधिनियम, 1956 के खिलाफ हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि 2026 के नियमों में जाति आधारित भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित कर दिया गया है, जबकि समानता का अधिकार सभी छात्रों के लिए होना चाहिए। इसके अलावा, 2012 के नियमों में मौजूद झूठी शिकायतों पर कार्रवाई की व्यवस्था को नए नियमों से हटा दिया गया, जिससे दुरुपयोग की आशंका बढ़ गई।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर देशभर में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आईं। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि अदालत ने यह सुनिश्चित किया है कि किसी के साथ अन्याय न हो और कानून की भाषा व मंशा स्पष्ट होनी चाहिए। बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने विश्वविद्यालयों में बने सामाजिक तनाव के मद्देनज़र इस रोक को उचित बताया और कहा कि यूजीसी को सभी पक्षों से संवाद करना चाहिए था। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि सरकार अदालत के आदेश का सम्मान करेगी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी किसी के साथ भेदभाव नहीं किया। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करेगी।

कांग्रेस नेता टी.एस. सिंह देव ने नए नियमों में झूठी शिकायतों पर कार्रवाई की धारा हटाए जाने को बड़ी खामी बताया, जबकि आम आदमी पार्टी के सांसद मलविंदर सिंह कांग ने कहा कि ऐसे नियम संस्थानों की स्वायत्तता और मेरिट को कमजोर करते हैं। कई अन्य नेताओं और सामाजिक हस्तियों ने भी अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए शिक्षा व्यवस्था में संतुलन और समावेशन की जरूरत पर जोर दिया।

गौरतलब है कि यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव रोकना था, जिसके तहत विशेष समितियों और हेल्पलाइनों के गठन का प्रावधान किया गया था। हालांकि, खासकर जनरल कैटेगरी के छात्रों ने इन नियमों के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए आरोप लगाया था कि इनमें बराबरी के बजाय विभाजन को बढ़ावा देने की आशंका है और झूठी शिकायतों से बचाव का कोई स्पष्ट तंत्र नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि यूजीसी और सरकार इन नियमों में किस तरह संशोधन कर सभी वर्गों के लिए न्यायसंगत और संतुलित ढांचा तैयार करती है।

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