तिरुवनंतपुरम/नई दिल्लीः कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने मंगलवार को राष्ट्रीय परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं को लेकर केंद्र सरकार पर कड़ा हमला बोला। उन्होंने नीट-यूजी पेपर लीक विवाद को “पूरी पीढ़ी के साथ विश्वासघात” बताते हुए परीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए।
परीक्षा व्यवस्था पर उठाए सवाल
मीडिया से बातचीत में शशि थरूर ने कहा कि जब परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता पर ही भरोसा न रहे तो लाखों छात्रों की मेहनत प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि बार-बार पेपर लीक, भ्रष्टाचार और परीक्षा रद्द होने की घटनाएं व्यवस्था की गंभीर खामियों को दर्शाती हैं।
उन्होंने भारत की परीक्षा प्रणाली की तुलना अंतरराष्ट्रीय परीक्षाओं जैसे एसएटी और कैंब्रिज एग्जाम से करते हुए सवाल उठाया कि ऐसी समस्याएं केवल भारत में ही क्यों सामने आती हैं। उन्होंने इसके लिए राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए), शिक्षा मंत्रालय और केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया। थरूर ने कहा कि यह पहली घटना नहीं है और अब इस तरह की स्थिति दोबारा नहीं होनी चाहिए।
नीट-यूजी 2026 विवाद और जांच
गौरतलब है कि पेपर लीक और प्रशासनिक अनियमितताओं के आरोपों के चलते नीट-यूजी 2026 परीक्षा को पुनर्निर्धारित कर 21 जून को आयोजित किया जाएगा। मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) कर रही है और कई गिरफ्तारियां भी हो चुकी हैं। देश के कई हिस्सों में छात्र संगठनों द्वारा विरोध प्रदर्शन भी जारी हैं।
वंदे मातरम मुद्दे पर केरल सरकार का समर्थन
इसी बीच थरूर ने केरल विधानसभा में “वंदे मातरम” के पूर्ण पाठ के उपयोग को लेकर चल रहे विवाद में राज्य सरकार का पक्ष लिया। उन्होंने कहा कि केवल शुरुआती अंश का प्रयोग लंबे समय से प्रचलित परंपरा रही है और इसे ही स्वीकार किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पूरे गीत का गायन व्यावहारिक रूप से कठिन है और इसे अनिवार्य बनाना उचित नहीं है। थरूर ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार पर राजनीतिक दृष्टिकोण अपनाने का आरोप लगाया।
थरूर ने केरल के पूर्व मुख्य निर्वाचन अधिकारी रतन यू. केलकर की मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव के रूप में नियुक्ति को लेकर किसी विवाद से इनकार किया। साथ ही उन्होंने राफेल लड़ाकू विमान सौदे पर सरकार की नीति की आलोचना करते हुए कहा कि यदि मूल समझौता बरकरार रहता तो देश को अधिक लाभ मिल सकता था।
थरूर के इन बयानों के बाद शिक्षा प्रणाली और सांस्कृतिक नीतियों को लेकर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है, खासकर ऐसे समय में जब परीक्षा पारदर्शिता को लेकर पहले से ही सवाल उठ रहे हैं।