नई दिल्लीः केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने भरण-पोषण से जुड़े वैवाहिक विवादों में एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि पत्नी को पति की आय से संबंधित सामान्य जानकारी उपलब्ध कराई जा सकती है। इसे निजता के आधार पर रोका नहीं जा सकता। आयोग ने स्पष्ट किया कि यदि पति-पत्नी के बीच भरण-पोषण या वैवाहिक विवाद से जुड़ा मामला किसी सक्षम अदालत में लंबित है, तो आयकर विभाग को पति की सकल या करयोग्य आय का सामान्य विवरण देना होगा। बशर्ते पत्नी अपने वैवाहिक संबंध और मुकदमे की पुष्टि से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत करे। हालांकि, आयोग ने यह भी साफ किया कि आयकर रिटर्न की प्रतियां, पैन विवरण या अन्य व्यक्तिगत और संवेदनशील जानकारियां साझा नहीं की जाएंगी।
यह आदेश उस मामले में पारित किया गया जिसमें एक महिला ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत अपने पति की पिछले पांच आकलन वर्षों की आय की जानकारी मांगी थी। महिला का आरोप था कि उसका पति वास्तविक आय छिपाकर भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास कर रहा है। आयकर विभाग ने पहले इस आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह तीसरे पक्ष से जुड़ी व्यक्तिगत जानकारी है, जिसे RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) के तहत सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। हालांकि, अपील पर सुनवाई करते हुए सूचना आयुक्त विनोद कुमार तिवारी ने माना कि जब आय से संबंधित जानकारी वैधानिक भरण-पोषण के निर्धारण के लिए आवश्यक हो, तब इसे पूरी तरह निजी नहीं माना जा सकता।
आयोग ने अपने आदेश में कहा कि ऐसी जानकारी पत्नी की आजीविका और भरण-पोषण के अधिकार से सीधे जुड़ी होती है और इसके अभाव में न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसी तरह के एक अन्य मामले में भी आयोग ने परित्यक्त पत्नी को पति की आय की सीमित जानकारी देने का निर्देश दिया और कहा कि केवल सामान्य आय विवरण उपलब्ध कराया जाए, न कि विस्तृत कर दस्तावेज।
हालांकि, आयोग ने वित्तीय संस्थानों के पास उपलब्ध जानकारियों को लेकर अलग रुख अपनाया। भारतीय स्टेट बैंक से जुड़े मामलों में CIC ने स्पष्ट किया कि बैंक खातों, जमा राशि और लॉकर से संबंधित विवरण बैंक के पास फिड्यूशियरी क्षमता में होते हैं और इन्हें RTI अधिनियम के तहत साझा नहीं किया जा सकता। आयोग के अनुसार, इस तरह की जानकारियां धारा 8(1)(e) और 8(1)(j) के अंतर्गत संरक्षित हैं और इनका खुलासा निजता के अधिकार का उल्लंघन होगा।
इस फैसले को भरण-पोषण मामलों में पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे अदालतों को पति की वास्तविक आर्थिक स्थिति समझने में मदद मिलेगी, जबकि साथ ही व्यक्तिगत और संवेदनशील जानकारियों की गोपनीयता भी बनी रहेगी।