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केंद्र सरकार की बड़ी योजना, निजी अस्पतालों में घट सकती है इलाज की लागत

निजी अस्पतालों की मनमानी पर रोक लगाने की तैयारी में केंद्र सरकार।

By शिखा सिंह

Apr 23, 2026 16:02 IST

नई दिल्ली : केंद्र सरकार द्वारा निजी अस्पतालों में चिकित्सा उपकरणों की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए एक महत्वपूर्ण नीति पर काम किया जा रहा है जिससे मरीजों और उनके परिजनों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। प्रस्तावित योजना के तहत “ट्रेड मार्जिन” पर सीमा तय करने की तैयारी है जिससे कई चिकित्सा उपकरणों की कीमतों में भारी कमी आ सकती है।

निजी अस्पतालों में लंबे समय से यह शिकायत रही है कि उपचार का बिल अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर वसूला जाता है। कई बार मरीजों को इलाज के नाम पर भारी आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है यहां तक कि परिवारों की बचत और संपत्ति तक बिकने की नौबत आ जाती है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार अस्पताल आमतौर पर स्टेंट, इम्प्लांट, सिरिंज और अन्य चिकित्सा उपकरण वितरकों से खरीदते हैं और फिर उन्हें मरीजों को बेचते हैं। लेकिन अस्पताल इन उपकरणों पर खरीद मूल्य से कई गुना अधिक दर पर बिल बनाते हैं। इसी अंतर को “ट्रेड मार्जिन” कहा जाता है। अब सरकार इसी मार्जिन पर सीमा लगाने की योजना बना रही है जिससे अस्पताल तय सीमा से अधिक लाभ नहीं कमा सकेंगे।

हालांकि इस कैप को किस तरह लागू किया जाएगा यह अभी अंतिम रूप से तय नहीं हुआ है। इस विषय पर केंद्र सरकार निजी अस्पतालों, बीमा कंपनियों और मेडिकल डिस्ट्रीब्यूटरों के साथ लगातार चर्चा कर रही है। यह प्रस्ताव सामान्य चिकित्सा सामग्री जैसे सिरिंज, ग्लव्स, कैनुला के साथ-साथ महंगे उपकरण जैसे पेसमेकर और हार्ट वॉल्व पर भी लागू हो सकता है।

सरकारी स्तर पर कई शिकायतें प्राप्त हुई हैं जिनमें दावा किया गया है कि कुछ अस्पताल चिकित्सा उपकरणों की वास्तविक कीमत से 10 से 30 गुना तक अधिक शुल्क वसूल रहे हैं। उदाहरण के तौर पर जिस सिरिंज की कीमत लगभग 3 रुपये बताई जाती है उसके लिए मरीजों से लगभग 30 रुपये तक लिए जाने की शिकायत है। इसी तरह 6 रुपये की कैनुला के लिए 120 रुपये तक वसूले जाने के आरोप सामने आए हैं।

सबसे गंभीर स्थिति महंगे चिकित्सा उपकरणों में देखी जा रही है। आरोपों के अनुसार लगभग 25,000 रुपये कीमत वाले पेसमेकर के लिए मरीजों से 2 लाख रुपये तक वसूले जा रहे हैं। वहीं हार्ट वॉल्व जिसकी वास्तविक कीमत करीब 4 लाख रुपये बताई जाती है उसके लिए 26 से 30 लाख रुपये तक का बिल बनाए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। यदि ट्रेड मार्जिन पर यह प्रस्ताव लागू होता है तो इन उपकरणों की कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट संभव है।

इस बढ़े हुए चिकित्सा खर्च का असर केवल मरीजों पर ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य बीमा उद्योग पर भी पड़ रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार आने वाले डेढ़ वर्षों में बीमा प्रीमियम में 10 से 15 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। वर्तमान में चिकित्सा क्षेत्र में वार्षिक मूल्य वृद्धि दर लगभग 14 से 15 प्रतिशत मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अस्पतालों के अतिरिक्त शुल्क आधुनिक चिकित्सा तकनीकों की बढ़ती लागत और बढ़ते बीमा क्लेम-ये सभी मिलकर स्वास्थ्य बीमा खर्च को लगातार बढ़ा रहे हैं।

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