नई दिल्लीः मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों ने 12 मार्च को संसद के दोनों सदनों के सचिवालय में रिमूवल नोटिस पेश किया था। इस नोटिस में कुल 193 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। यह पहला मौका है जब किसी मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ विपक्ष ने औपचारिक रूप से नोटिस पेश किया है।
लेकिन अब दो हफ्ते हो गए, फिर भी संसद सचिवालय ने इस नोटिस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। इस चुप्पी को तृणमूल कांग्रेस ने गंभीरता से लिया है और इसे सरकार और चुनाव आयोग के बीच गठजोड़ का संकेत बताया है।
तृणमूल कांग्रेस का आरोप
राज्यसभा में तृणमूल नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा कि अगर विपक्ष ने कोई गलती की है तो नोटिस को खारिज कर दिया जाए। लेकिन पूरी तरह चुप रहना लोकतंत्र और संसदीय प्रक्रिया के खिलाफ है। उन्होंने कहा, “सरकार संसद की नजरअंदाजी कर रही है और विपक्ष को सवाल पूछने से रोक रही है। क्या संसद का काम खत्म होने तक सब कुछ भूला दिया जाएगा?”
विपक्ष की अगली रणनीति
संसदीय सूत्रों के अनुसार, विपक्ष बजट सत्र खत्म होने से पहले सचिवालय से संपर्क करेगा और नोटिस पर आधिकारिक जवाब मांगेगा। नोटिस में कहा गया है कि आयुक्त के खिलाफ गंभीर आरोप हैं और इसे संसद की प्रक्रिया के अनुसार ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारतीय संसदीय लोकतंत्र में अनूठा है और आने वाले हफ्तों में सचिवालय की प्रतिक्रिया से चुनाव आयोग और संसद के बीच संतुलन पर असर पड़ सकता है। 193 सांसदों द्वारा पेश किया गया यह रिमूवल नोटिस इतिहास में पहली बार हुआ है। यह मुख्य निर्वाचन आयुक्त की भूमिका और निष्पक्षता पर सवाल उठाता है और भविष्य में चुनाव आयोग और संसद के बीच संतुलन पर प्रभाव डाल सकता है।