अनिर्बाण घोष
डायबिटीज मॉनिटरिंग और डायग्नोसिस के लिए लोकप्रिय और व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाली रक्त जांच है एचबीए1सी टेस्ट लेकिन भारत जैसे देश में, जहां कुपोषण और अन्य कारणों से एनीमिया तथा विभिन्न रक्त रोग बड़ी समस्या हैं, वहां सभी मरीजों के मामले में केवल इस जांच पर आंख बंद कर भरोसा करना मुश्किल है क्योंकि यह एचबीए1सी जांच हमेशा सही तस्वीर पेश नहीं करती।
कोलकाता, दिल्ली और मुंबई के चिकित्सकों द्वारा किए गए एक शोध में यही बात सामने आई है। शोधपत्र हाल ही में द लैंसेट रीजनल हेल्थ साउथईस्ट एशिया पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं का कहना है कि अन्य जांचों को नजरअंदाज कर केवल एचबीए1सी पर निर्भर रहने से किसी का डायबिटीज समय पर पकड़ा नहीं जा सकता, वहीं कोई व्यक्ति स्वस्थ होते हुए भी अनावश्यक रूप से रोगी घोषित हो सकता है इसलिए एचबीए1सी के साथ पारंपरिक फास्टिंग और पीपी ब्लड शुगर की निगरानी भी जरूरी है। अन्यथा केवल एचबीए1सी जांच शुगर नियंत्रण की भ्रामक तस्वीर दे सकती है इसीलिए यह टेस्ट स्वयं करवाकर निर्णय लेने से पहले विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह लेना जरूरी है।
एचबीए1सी जांच लोकप्रिय क्यों है इसका कारण यह है कि यह जांच एक दिन की तत्काल स्थिति नहीं दिखाती बल्कि तीन महीने की औसत ब्लड शुगर का चित्र प्रस्तुत करती है और इस टेस्ट के लिए खाने या खाली पेट रहने की कोई अनिवार्यता नहीं है। विशेषज्ञ बताते हैं कि शरीर में मौजूद शर्करा का एक हिस्सा हीमोग्लोबिन से जुड़ जाता है, जिसे ग्लाइकोसाइलेटेड हीमोग्लोबिन कहा जाता है चूंकि एक लाल रक्त कणिका में मौजूद हीमोग्लोबिन की आयु लगभग तीन महीने होती है इसलिए ग्लाइकोसाइलेटेड हीमोग्लोबिन की रिपोर्ट तीन महीने की ब्लड शुगर का संकेत देती है।
लेकिन यदि एनीमिया या किसी अन्य रक्त रोग के कारण खून में हीमोग्लोबिन की मात्रा कम या असामान्य हो, या कोई आनुवंशिक रक्त रोग हो, या शरीर में जी6पीडी एंजाइम की कमी हो जो लाल रक्त कणिकाओं की रक्षा करता है, तब ब्लड शुगर की सही तस्वीर सामने नहीं आती। यह जानकारी परियोजना के मुख्य शोधकर्ता, कोलकाता के क्लिनिकल फार्माकोलॉजी विशेषज्ञ शांब सम्राट समाजदार ने दी। उनका कहना है कि भारत में ऐसे रक्त रोग बहुत सामान्य हैं और इन लोगों की एचबीए1सी रिपोर्ट वास्तविक ब्लड शुगर स्थिति से मेल नहीं खाती। गलत निदान और उपचार से बचने के लिए अन्य जांच भी जरूरी हैं।
सह शोधकर्ता, दिल्ली के पद्मश्री सम्मानित एंडोक्रिनोलॉजी विशेषज्ञ अनुप मिश्रा का कहना है कि इसी कारण भारत में डायबिटीज के निदान और उपचार में आंख बंद कर एचबीए1सी पर भरोसा करना हानिकारक हो सकता है। शोध में पाया गया है कि कई भारतीयों में रक्त शर्करा का स्तर असामान्य होने पर भी एचबीए1सी सामान्य दिखा सकता है और कभी कभी इसका उलटा भी होता है।
एक अन्य सह शोधकर्ता, मुंबई के प्रसिद्ध एंडोक्रिनोलॉजिस्ट शशांक जोशी के अनुसार एचबीए1सी के परिणाम को अंतिम मान लेना उचित नहीं है। उनका सुझाव है कि सटीक निदान के लिए फास्टिंग, पीपी और रैंडम ब्लड शुगर जांच भी जरूरी हैं। हालांकि एंडोक्रिनोलॉजी विशेषज्ञ सुजय घोष का कहना है कि अन्य जांचों की तरह एचबीए1सी टेस्ट की भी कुछ सीमाएं हैं। इस विषय को विशेषज्ञ चिकित्सक जानते और समझते हैं और सब कुछ ध्यान में रखकर ही एचबीए1सी कराने की सलाह देते हैं। मेडिसिन विशेषज्ञ पार्थसारथी कर्मकार का भी यही मत है कि सभी पहलुओं को परखकर ही जांच रिपोर्ट का विश्लेषण कर उपचार किया जाता है। टेस्ट रिपोर्ट के साथ क्लिनिकल संबंध स्थापित करना भी जरूरी है इसलिए दोनों विशेषज्ञ बिना चिकित्सकीय परामर्श के स्वयं डायबिटीज का निदान या उपचार न करने की सलाह देते हैं।