हर साल 4 फरवरी को दुनियाभर में वर्ल्ड कैंसर डे मनाया जाता है। जैसे-जैसे समय बीत रहा है, कैंसर का खतरा बढ़ता जा रहा है। इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर के अनुसार, वर्ष 2022 में दुनिया भर में लगभग 2 करोड़ नए कैंसर मरीज सामने आए थे। इस बीमारी से करीब 97 लाखों लोगों की मौत हुई।
भारत की स्थिति भी चिंताजनक है। वर्ष 2019 में जहां कैंसर मरीजों की संख्या लगभग 13.5 लाख थी, वहीं 2024 में यह बढ़कर 15.3 लाख हो गई। हर साल के आंकड़े नई चेतावनी दे रहे हैं, 2020 में 13.9 लाख, 2021 में 14.2 लाख, 2022 में 14.6 लाख और 2023 में 14.9 लाख कैंसर के मामले सामने आए 2026 के वर्ल्ड कैंसर डे की थीम "यूनाइटेड बाय यूनिक" यह याद दिलाती है कि बीमारी से पहले मरीज आता है। यह ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था की बात करती है, जो हर व्यक्ति की जरूरत को समझे और उसके साथ खड़ी रहे।
कैंसर से कैसे लड़ें?
कैंसर का इलाज केवल दवाइयों या अस्पताल तक सीमित नहीं है। इसके साथ स्क्रीनिंग, सही उपचार और आसपास के लोगों का व्यवहार भी गहराई से जुड़ा होता है। कैंसर से लड़ने में ये तीनों बातें क्यों जरूरी हैं, आइए समझते हैं।
स्क्रीनिंग का महत्व
स्क्रीनिंग कैंसर उपचार की पहली और सबसे अहम कड़ी है। समय पर जांच कराने से कई मामलों में बीमारी शुरुआती चरण में ही पकड़ में आ जाती है, जिससे इलाज आसान और अधिक सफल होता है। लेकिन डर, झिझक या लापरवाही के कारण कई लोग स्क्रीनिंग से बचते हैं। यदि परिवार शुरू से जागरूक रहे, साथ दे और जांच के लिए प्रोत्साहित करे, तो मरीज मानसिक रूप से मजबूत बना रहता है।
डॉक्टरों के अनुसार ब्रेस्ट कैंसर और सर्वाइकल कैंसर जैसे मामलों में स्क्रीनिंग बेहद जरूरी है। स्क्रीनिंग का मतलब केवल जांच कराना नहीं बल्कि अपने शरीर के प्रति सजग रहना भी है। शरीर में किसी भी असामान्य बदलाव पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। विशेषज्ञ बताते हैं कि कैंसर संक्रामक नहीं है लेकिन यह पीढ़ी दर पीढ़ी आनुवंशिक रूप से आ सकता है इसलिए परिवार में किसी को कैंसर होने पर अन्य सदस्यों को भी स्क्रीनिंग करानी चाहिए। आजकल साधारण रक्त जांच या लार की जांच से भी कई प्रकार के कैंसर का पता लगाया जा सकता है। कुछ मामलों में बायोप्सी या अल्ट्रासाउंड की जरूरत पड़ती है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही आगे बढ़ना चाहिए।
परिवार और पड़ोसियों का व्यवहार
इलाज के दौरान मरीज केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक रूप से भी टूट सकता है। कीमोथेरेपी, रेडिएशन या सर्जरी के दुष्प्रभाव धैर्य की परीक्षा लेते हैं। ऐसे समय में परिवार की भूमिका बेहद अहम होती है। बेवजह डर दिखाना, नकारात्मक बातें कहना या दूसरों के बुरे अनुभव सुनाना मरीज का मनोबल तोड़ देता है।
कैंसर का मतलब मौत नहीं होता। समय पर स्क्रीनिंग और सही इलाज से इस बीमारी को हराया जा सकता है। हालांकि यह एक लंबी लड़ाई है, जिसमें धैर्य जरूरी है। इलाज के दौरान मरीज को सकारात्मक रखने में पड़ोसी और आसपास के लोग भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। सहानुभूति, धैर्य और सकारात्मक व्यवहार मरीज को मानसिक रूप से मजबूत बनाते हैं। उसकी बात ध्यान से सुनना, छोटी-छोटी जरूरतों का ख्याल रखना और इलाज में सहयोग करना मरीज का आत्मविश्वास बढ़ाता है। कई बार प्यार और मानसिक समर्थन दवाइयों से भी ज्यादा असरदार साबित होता है।
याद रखें, समय पर जांच से कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं। फिर भी आज भी बहुत से लोग नियमित स्क्रीनिंग नहीं कराते। ब्रेस्ट, सर्वाइकल, ओरल या कोलन कैंसर जैसी बीमारियों की जांच को बार-बार टालना सही नहीं है। इन्हें नजरअंदाज करके बचा नहीं जा सकता, बल्कि नियमित जांच और सही इलाज से ही कैंसर पर जीत संभव है।