नई दिल्ली: भारतीय रेलवे पिछले कुछ वर्षों से आधुनिक ट्रेनों, वंदे भारत जैसी हाई-स्पीड सेवाओं और तकनीकी उन्नयन को अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करता रहा है। हालांकि संसद की लोक लेखा समिति (PAC) की ताजा रिपोर्ट इन दावों की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े करती है। रिपोर्ट बताती है कि 2021-22 में 90 प्रतिशत से अधिक ट्रेनों की समयपालन (Punctuality) दर 2023-24 में गिरकर 73.62 प्रतिशत रह गई-यानी हर चार में से एक ट्रेन समय से नहीं चल रही थी।
आंकड़ों का खेल या व्यवस्था की कमजोरी?
PAC की सबसे बड़ी आपत्ति रेलवे द्वारा समयपालन (पंक्चुअलिटी) मापने के तरीके को लेकर है। भारतीय रेलवे केवल अंतिम स्टेशन पर ट्रेन के पहुंचने के समय को आधार बनाता है और 15 मिनट तक की देरी को भी ‘समय पर’ मान लेता है। इससे यात्रियों को रास्ते में झेलनी पड़ने वाली देरी आंकड़ों में गायब हो जाती है। समिति का मानना है कि यह तरीका न केवल अधूरा है, बल्कि रेलवे के प्रदर्शन की एक भ्रामक तस्वीर पेश करता है।
इसके उलट, जापान जैसे देशों में समयपालन (पंक्चुअलिटी) को सेकेंड्स में मापा जाता है और तय समय से पहले पहुंचना भी चूक माना जाता है। इस तुलना से साफ होता है कि भारतीय रेलवे वैश्विक मानकों से काफी पीछे है।
गिरावट के पीछे के कारण
रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि 2015-16 में समयपालन दर 77.51 प्रतिशत थी, जो 2018-19 में घटकर 69.23 प्रतिशत रह गई। महामारी के बाद 2021-22 में इसमें अस्थायी सुधार जरूर दिखा, लेकिन यह टिक नहीं सका। 2023-24 में फिर से गिरावट दर्ज की गई।
ICMS डेटा के मुताबिक, ट्रेनों में देरी के 33 कारणों में से 27 रेलवे के नियंत्रण में हैं। 2017-19 के दौरान केवल 12.89 प्रतिशत देरी बाहरी कारणों से हुई, जबकि 66 प्रतिशत देरी आंतरिक कारणों से-यानी बेहतर योजना, समन्वय और प्रबंधन से इन्हें काफी हद तक रोका जा सकता था।
मिशन रफ्तार: लक्ष्य और हकीकत
रेलवे की महत्वाकांक्षी योजना ‘मिशन रफ्तार’ का उद्देश्य मालगाड़ियों और मेल/एक्सप्रेस ट्रेनों की औसत गति को लगभग दोगुना करना था। लेकिन PAC के अनुसार, यह लक्ष्य अब भी दूर है। मेल/एक्सप्रेस ट्रेनों की औसत गति सिर्फ 50.6 किमी प्रति घंटा और मालगाड़ियों की 23.6 किमी प्रति घंटा तक ही पहुंच सकी है। समिति का मानना है कि सभी जोनल रेलवे को जोड़कर एकीकृत रणनीति की कमी इस असफलता का बड़ा कारण है।
तेज ट्रेनें बनाम आम यात्री
हालांकि समिति ने वंदे भारत और आधुनिक कोचों की शुरुआत को सकारात्मक कदम माना है, लेकिन यह भी साफ किया है कि रेलवे नेटवर्क का बड़ा हिस्सा अब भी सामान्य पैसेंजर, एक्सप्रेस और सुपरफास्ट ट्रेनों पर निर्भर है। रिपोर्ट में यह साफ कहा गय है कि चुनिंदा तेज ट्रेनों से पूरे सिस्टम की कमजोरियों को नहीं छुपाया जा सकता।
PAC ने समयपालन की निगरानी को शुरुआती और मध्यवर्ती स्टेशनों तक विस्तारित करने, रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम अपनाने और पैसेंजर ट्रेनों को DEMU/MEMU में बदलने की प्रक्रिया तेज करने की सिफारिश की है। मालगाड़ियों के लिए स्पष्ट समय-सारिणी तय करने पर भी जोर दिया गया है।
कुल मिलाकर, रिपोर्ट यह संकेत देती है कि समस्या तकनीक या संसाधनों की नहीं, बल्कि समन्वय, पारदर्शिता और जवाबदेही की है। जब तक रेलवे समयपालन को आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि यात्री अनुभव का पैमाना नहीं मानेगा, तब तक रफ्तार और सुधार के दावे पटरी पर ही अटके रहेंगे।