अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का वेनेजुएला पर गैर-कानूनी हमला और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी का अपहरण अमेरिका को उन बदमाश देशों की लीग में शामिल कर देता है, जिसके प्रमुख सदस्य रूस और इजराइल हैं। हम इस मुद्दे पर वापस आएंगे।
हालांकि यह हमला गैर-कानूनी तो था लेकिन अप्रत्याशित नहीं था। अगस्त 2025 में अमेरिका ने युद्धपोतों और सैन्य कर्मियों के साथ दक्षिणी कैरेबियन सागर में नौसैनिकों की तैनाती बढ़ा दी थी। सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) ने मादुरो के बारे में पता करने के लिए वेनेजुएला में एक टीम भी भेजी थी। सितंबर में अमेरिकी सेना ने इस क्षेत्र में वेनेजुएला के जहाजों पर सैन्य हमले शुरू किए, और नवंबर 2025 में वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो ने मियामी में एक व्यापारिक बैठक के दौरान वेनेजुएला के राष्ट्रीयकृत तेल और गैस भंडार को निजी कंपनियों के लिए खोलने का वादा किया।
इस बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी उपस्थिति भी उल्लेखनीय रही। ऐसी अविश्वसनीय रिपोर्टें सामने आई कि ट्रंप प्रशासन ने मादुरो की सरकार के साथ उसके तेल भंडार के बारे में गुप्त रूप से बातचीत शुरू कर दी है। दिसंबर में स्थिति और बिगड़ गई जिसमें बैन किए गए वेनेज़ुएला के कच्चे तेल ले जा रहे तेल टैंकरों को जब्त करना और काउबॉय स्टाइल में जहाजों पर चढ़ना शामिल था।
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अपने पुराने तरीके पर लौटते हुए ट्रंप ने फिर से बेधड़क झूठ बोलना शुरू कर दिया और यह बेतुका दावा तक कर दिया कि वेनेजुएला के तेल भंडार अमेरिका से चुराए गए थे। तेल टैंकरों को जब्त करना जनवरी 2026 के हमलों से पहले की बड़ी नाकाबंदी का हिस्सा था जो 3 जनवरी की सुबह संप्रभु देश पर बड़े हवाई हमले के साथ शुरू हुआ था। इसके बाद अमेरिकी सैनिकों ने वेनेजु़एला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को पकड़ लिया।
तकनीकी तौर पर उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज इंचार्ज हैं जिन्हें वेनेजुएला की सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम राष्ट्रपति नियुक्त किया है। लेकिन दुनिया को बस इतना ही पता है कि देश में असल में क्या हो रहा है। डोनाल्ड ट्रंप, जो अब असल में नॉर्थ कोरिया के किम जोंग उन की तरह एक अंतर्राष्ट्रीय दुष्ट अभिनेता बन गए हैं, ने कहा है, 'हम तब तक देश चलाएंगे जब तक हम एक सुरक्षित, सही और समझदारी वाला परिवर्तन नहीं कर लेते।'
लेकिन यह बिल्कुल भी स्पष्ट नहीं है कि इसका असल में क्या मतलब है। खासकर इसलिए क्योंकि रोड्रिग्ज ने कहा है कि वह और उनका देश अमेरिका के हमले और 'देश चलाने की कोशिश' का विरोध करेंगे। उन्होंने कहा कि मादुरो वेनेजुएला के एकमात्र राष्ट्रपति हैं और उनका देश 'अंतर्राष्ट्रीय और वेनेजुएला के कानून के दायरे में' अमेरिका के साथ सम्मानजनक रिश्ते के लिए तैयार है। उन्होंने कहा, " जब उन्होंने हमारे प्यारे देश पर सैन्य हमला किया उसके बाद इसी एकमात्र प्रकार के रिश्ते को मैं स्वीकार करूंगी।"
यह ट्रंप के इस दावे का ज़ोरदार खंडन था कि उन्होंने 'अमेरिका जो भी कहेगा, वह करने' की इच्छा जताई थी। रोड्रिग्ज पर विश्वास करना आसान है क्योंकि पूरी दुनिया जानती है कि ट्रंप को इस बात का कोई अंदाजा नहीं है कि सच कहां खत्म होता है और झूठ कहां से शुरू होता है।
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इस बात को वेनेजुएला सरकार की तरफ से नागरिकों से अमेरिकी हमले के खिलाफ उठ खड़े होने की अपील से और बल मिला और कहा गया कि वाशिंग्टन 'सैन्य आक्रामकता' के 'बेहद गंभीर' काम से लैटिन अमेरिका को अराजकता में धकेलने का जोखिम उठा रहा है। इसमें आगे कहा गया, "इस साम्राज्यवादी आक्रामकता को हराने के लिए पूरे देश को एकजुट होना होगा।"
एक दिन के ही अंदर अमेरिकी प्रशासन अपने बड़े-बड़े दावों से पीछे हटता दिख रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने 4 जनवरी को कहा कि अमेरिका शासन चलाने में रोजाना कोई भूमिका नहीं निभाएगा।
दिखावे के लिए ट्रंप प्रशासन ने हमले और अपहरण को सही ठहराने के लिए मादुरो पर ड्रग तस्करी के आरोप लगाए हैं लेकिन ट्रंप ने अपने हाव-भाव से ही सब कुछ साफ कर दिया है। यह सब एक आजाद देश की प्राकृतिक सम्पदा को चुराने के लिए किया गया है और इस मामले में वह सम्पदा तेल। वेनेजुएला दुनिया में तेल भंडार के मामले में सबसे अमीर देश है।
अभियान के तुरंत बाद ट्रंप ने कहा कि अमेरिका देश के तेल सेक्टर में जोरदार तरीके से शामिल होगा। उन्होंने कहा, "हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी, सबसे बेहतरीन तेल कंपनियां हैं और हम इसमें बहुत ज्यादा शामिल होने वाले हैं।"
रूबियो ने बाद में साफ करते हुए इस बात पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका मौजूदा 'ऑयल क्वारंटाइन' को लागू करना जारी रखेगा और उस ताकत का इस्तेमाल करके संकटग्रस्त देश में जो भी सरकार औपचारिक रूप से सत्ता में होगी उस पर दबाव डालेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका 'ऑयल नाकाबंदी, जो पहले से ही लागू है, को लागू करना जारी रखेगा और इसका इस्तेमाल वेनेजुएला की नीतियों में बदलाव के लिए दबाव डालने के लिए करेगा'।
कुल मिलाकर वेनेजुएला में जो हुआ उसके तत्व कुछ नतीजों की ओर इशारा करते हैं। पहला और निश्चित रूप से सबसे जरूरी नतीजा यह है कि हमले का मुख्य मकसद वेनेजुएला के तेल भंडार पर नियंत्रण स्थापित करना है और ट्रंप, जैसा कि पिछले राष्ट्रपतियों ने भी किया है, अमेरिकी कॉर्पोरेट और बिजनेस हितों के इशारे पर काम कर रहे हैं। इस मामले में वे शक्तिशाली तेल कंपनियां जो उस फायदे का हिस्सा चाहती हैं जिससे उन्हें इतने लंबे समय से वंचित रखा गया है।
दूसरा कारण ट्रंप के रवैये को देखते हुए यह लगता है कि उस घमंडी राष्ट्रपति को आखिरकार एहसास हो गया है कि उसके अनुमोदन की रेटिंग पूरी तरह से गिर गई हैं और किसी भी मौजूदा राष्ट्रपति के लिए रिकॉर्ड निचले स्तर पर हैं : द इकोनॉमिस्ट के ट्रैकर के अनुसार 5 जनवरी को -17 प्रतिशत। यह इस स्थिति को सुधारने की एक कोशिश है।
दूसरे देशों में सैन्य अभियान लंबे समय से नाकाबिल और तानाशाह नेताओं का पसंदीदा समाधान रहा है। अति-राष्ट्रवादी उन्माद भड़काना इस खेल का हिस्सा है जैसा कि हम भारत में बैठे हुए अच्छी तरह जानते हैं, जो एक और नाकाम लोकतंत्र है जिसे एक एथनोफासिस्ट सरकार चला रही है।
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तीसरा नतीजा यह है कि ट्रंप अब तानाशाही के अपने सपने को पूरा करने के लिए काफी हिम्मत जुटा रहे हैं क्योंकि उन्होंने अमेरिका में लोकतांत्रिक संस्थानों को सफलतापूर्वक खत्म कर दिया है और इस प्रक्रिया में प्रेस और शैक्षणिक संस्थानों की आजादी को भी दबा दिया है।
लेकिन हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि अमेरिकी सरकारों ने जिन्होंने कम से कम सीमित तरीके से देश में लोकतंत्र की रक्षा की है, उन्हें विदेशों में भी इसी तरह की कार्रवाई करने में कोई झिझक नहीं हुई है। उदाहरण के लिए 1989 में पनामा पर हमला और उसके राष्ट्रपति मैनुअल नोरिएगा का अपहरण। जैसा कि हम जानते हैं कि शीत युद्ध के दौरान दक्षिणपंथी तानाशाहों द्वारा तख्तापलट के लिए गुप्त फंडिंग और अन्य समर्थन देना आम बात थी।
अब सवाल यह है कि किसी देश की संप्रभुता के इस घोर उल्लंघन पर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कैसे प्रतिक्रिया देगी? खासकर जब ट्रंप ने अब कोलंबिया को धमकी दी है और संसाधन से भरपूर ग्रीनलैंड पर उनकी लंबे समय से नजर है। सिर्फ कुछ ही देशों ने विरोध किया है जिनमें ब्राजील, रूस और चीन शामिल हैं। भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को देखते हुए सिर्फ ब्राजील का नजरिया ही मायने रखता है।
संयुक्त राष्ट्र के सचिव-जनरल एंटोनियो गुटेरेस ने चिंता जताई है, यूरोपीय यूनियन शर्मनाक तरीके से चुप्पी साधे हुए है। ब्रिटेन ने प्रधानमंत्री कीर स्टारमर की चुप्पी के माध्यम से अमेरिका का ही साथ दिया है लेकिन वह अमेरिका का पालतू है; उससे किसी और चीज की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। फ्रांस और जर्मनी ने मादुरो को हटाने का स्वागत करते हुए सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की बात कहकर इस कार्रवाई का समर्थन किया है।
यह यूरोप को परेशान करने के लिए वापस लौटेगा जो एकमात्र ऐसा ब्लॉक था जो स्थिति में कुछ फर्क ला सकता था क्योंकि ट्रंप के कामों से यूक्रेन के मामले में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का हाथ मजबूत होगा। साथ ही यह चीन को अपने पड़ोस में दांव बढ़ाने का खुला न्योता है। दक्षिण अमेरिका और ग्रीनलैंड की तरह अब ताइवान को भी डरना चाहिए।
सबसे सीधे-सादे लोगों को छोड़कर कोई भी यह विश्वास नहीं करता है कि दुनिया नियमों पर आधारित व्यवस्था में संगठित है या संयुक्त राष्ट्र (UN) सिर्फ एक दिखावा नहीं है लेकिन जब दुनिया की सबसे मजबूत शक्ति इजराइल और रूस जैसे जाने-माने दुष्ट देशों के साथ मिलकर साम्राज्यवादी हमले करती है (हालांकि यह पश्चिम एशिया में एक अलग संदर्भ में हुआ है), तो हम मुश्किल में हैं। अगर पिछले चार साल यूक्रेन पर हमले और फिलिस्तीन में नरसंहार की वजह से विनाशकारी रहे हैं तो साल 2026 उनकी भयावहता को भी पार करने के संकेत दिखा रहा है।
अपहरण के बाद लगभग एक सप्ताह का समय बीच चुका है और जो कुछ भी हुआ है उससे ऐसा नहीं लगता कि ट्रंप की बिना वजह की आक्रामकता से पैदा हुआ हंगामा शांत होगा। ट्रंप ने 7 जनवरी को कहा कि अमेरिका भविष्य में वेनेजुएला पर कब्जा कर लेगा। उन्होंने यह बिल्कुल साफ कर दिया कि वॉशिंगटन सालों तक वेनेजुएला के बड़े तेल भंडार से तेल निकालता रहेगा। उन्होंने कब्जे वाले देश का प्रशासन अनिश्चित काल के लिए सीधे अपने हाथ में लेने की संभावना से भी इनकार नहीं किया था।
उनकी बातों से उनके प्रशासन के अधिकारियों के बयानों की झलक मिली। हालांकि अमेरिकी सीनेट के कुछ रिपब्लिकन और डेमोक्रेट सदस्यों ने वेनेजुएला के खिलाफ और आक्रामक कार्रवाई करने की ट्रंप की शक्ति को सीमित करने के लिए एक प्रस्ताव शुरू किया है लेकिन इसके कानून बनने की संभावना कम है क्योंकि राष्ट्रपति इस पर साइन नहीं करेंगे।
इस बीच खबर यह भी है कि ट्रंप के अधिकारी ग्रीनलैंड के खिलाफ सैन्य हमला करने के विकल्पों पर चर्चा कर रहे हैं। 6 यूरोपीय देशों ने डेनमार्क का समर्थन किया है, जिसने कहा है कि वह ग्रीनलैंड पर अमेरिका के दावों पर बात करना चाहता है। एक सैन्य अभियान के ऐसे नतीजे हो सकते हैं जिनका अंदाजा लगाना मुश्किल होगा लेकिन वे निश्चित रूप से बहुत बुरे होंगे। ऐसी कोई अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता नहीं है जो इस खतरे का सामना कर सके। इसलिए असली खतरा यह है कि दुनिया में हर तरफ अफरा-तफरी मच जाएगी।
क्या अमेरिकी ट्रंप समर्थकों को वोट देकर बाहर करके और उनके उत्तराधिकारियों को जवाबदेह ठहराकर इस प्रक्रिया में कुछ समझदारी लाएंगे? इसकी बहुत ही हल्की उम्मीद है।