एम्स्टर्डम : समुद्र के बीच बना विशाल बांध, डच इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना ‘अफ्सलाउटडाइक’ इन दिनों एक बार फिर चर्चा में है। रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटेन के साथ इस ऐतिहासिक बांध का दौरा किया। यह दौरा केवल औपचारिक नहीं था बल्कि इसके पीछे भारत की भविष्य की जल और बाढ़ प्रबंधन योजनाओं से जुड़ा बड़ा रणनीतिक कारण भी माना जा रहा है।नीदरलैंड की पहचान लंबे समय से समुद्र से संघर्ष करने वाले देश के रूप में रही है। सदियों तक समुद्री जल और बाढ़ से जूझने के बाद डच इंजीनियरों ने ऐसी तकनीक विकसित की जिसने दुनिया को चौंका दिया। इसकी सबसे बड़ी मिसाल है अफ्सलाउटडाइक बांध। इस बांध का निर्माण 1916 में आई भीषण बाढ़ के बाद शुरू किया गया था। उस विनाशकारी बाढ़ ने नीदरलैंड सरकार को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि समुद्र के खारे पानी को रोकने के लिए स्थायी समाधान निकालना होगा।
इसके बाद 1927 में उत्तर सागर के किनारे बांध निर्माण का काम शुरू हुआ। केवल पांच वर्षों में समुद्र के ऊपर एक विशाल जल अवरोधक तैयार कर लिया गया। यह बांध लगभग 32 किलोमीटर लंबा और करीब 90 मीटर चौड़ा है। इसके ऊपर से नीदरलैंड का राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरता है। बांध के एक तरफ उत्तर सागर का खारा पानी है जबकि दूसरी ओर आईजेलमीर नाम की मीठे पानी की विशाल झील मौजूद है। इस बांध की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह उत्तर सागर के खारे पानी को भीतर आने से रोकता है। समय के साथ भीतर का जल मीठे पानी में बदल गया जिसका उपयोग खेती, पेयजल और उद्योगों के लिए किया जाने लगा। समुद्री तूफान, जलवायु परिवर्तन और विनाशकारी बाढ़ से किसी देश को कैसे बचाया जा सकता है, अफ्सलाउटडाइक उसका जीवंत उदाहरण माना जाता है।
अब नीदरलैंड सरकार इस बांध को और अधिक आधुनिक बनाने में जुटी है। इंजीनियर ऐसे सुधार कर रहे है जिससे 10 हजार वर्षों में एक बार आने वाले भीषण तूफान का सामना भी किया जा सके। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दौरे के दौरान इंजीनियरों से इस परियोजना की तकनीकी बारीकियों को समझा और पूरे इलाके का निरीक्षण किया। दरअसल भारत में भी इसी तरह की विशाल जल प्रबंधन परियोजनाओं पर काम चल रहा है। देश के कई हिस्सों में एक ओर बाढ़ की समस्या बढ़ रही है तो दूसरी तरफ जल संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। खासकर तटीय राज्यों में समुद्र का खारा पानी अंदर घुसने, अत्यधिक बारिश और सूखे ने हालात और जटिल कर दिए हैं।
इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार गुजरात में ‘कल्पसर परियोजना’ शुरू करने की तैयारी कर रही है। इस परियोजना के तहत खंभात की खाड़ी पर लगभग 30 किलोमीटर लंबा बांध बनाया जाएगा। इसका उद्देश्य एक विशाल मीठे पानी का जलाशय तैयार करना है। योजना के अनुसार नर्मदा, माही, साबरमती और धाधर नदियों के पानी को इस जलाशय में संग्रहित किया जाएगा। बाद में इसी पानी का उपयोग सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक जरूरतों के लिए किया जाएगा। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अफ्सलाउटडाइक बांध में इतनी गहरी रुचि दिखाई दे रही है। माना जा रहा है कि भारत भविष्य में जल प्रबंधन और समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में डच तकनीक का उपयोग कर सकता है।
नीदरलैंड कई सदियों से समुद्र के साथ संघर्ष करते हुए जीवित रहा है। वहां बांध, नहर और जल नियंत्रण तकनीकों को लेकर दुनिया भर में विशेष पहचान है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे देश, जहां जलवायु परिवर्तन का असर तेजी से दिखाई दे रहा है, वहां डच तकनीक भविष्य में बेहद अहम भूमिका निभा सकती है। हालांकि गुजरात की कल्पसर परियोजना को लेकर अब भी कई सवाल बने हुए हैं। परियोजना को अभी पर्यावरणीय मंजूरी नहीं मिली है। इसके अलावा समुद्री मार्गों पर प्रभाव, मछलियों के प्रजनन और समुद्री पारिस्थितिकी से जुड़े मुद्दों पर भी बहस जारी है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री मोदी के इस दौरे ने साफ संकेत दिया है कि भारत आने वाले समय में जल संकट और बाढ़ जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए दीर्घकालिक योजनाओं पर गंभीरता से काम करना चाहता है।