जेरूसलम : इज़राइल की सरकार आर्मेनियाई नरसंहार को आधिकारिक मान्यता देने की दिशा में बड़ा कदम उठा सकती है। इज़राइल के विदेश मंत्री गिदोन सार ने घोषणा की है कि वह रविवार को होने वाली कैबिनेट बैठक में इस संबंध में एक प्रस्ताव पेश करेंगे। यदि कैबिनेट इस प्रस्ताव को मंजूरी देती है, तो इसे आगे विचार के लिए इज़राइल की संसद कनेस्सेट में भेजा जाएगा। इस फैसले से तुर्किये के साथ इज़राइल के संबंधों में नया तनाव पैदा होने की संभावना जताई जा रही है।
गिदोन सार ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर कहा कि आर्मेनियाई लोगों के खिलाफ उस्मानी साम्राज्य के अंतिम वर्षों में हुए नरसंहार को मान्यता देना इज़राइल का नैतिक और ऐतिहासिक दायित्व है। उन्होंने कहा कि इतिहास के इस अध्याय को स्वीकार करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि इससे जुड़े तथ्यों को नकारने, कमतर बताने या तोड़-मरोड़कर पेश करने के हर प्रयास की भी स्पष्ट रूप से निंदा की जानी चाहिए।
इज़राइली मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अब तक इज़राइल ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान आर्मेनियाई लोगों के साथ हुई घटनाओं को आधिकारिक रूप से "नरसंहार" नहीं माना था। इसकी प्रमुख वजह तुर्किये के साथ राजनयिक संबंधों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को माना जाता रहा है। हालांकि हाल के वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में लगातार तनाव बढ़ा है। विशेष रूप से 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले और उसके बाद गाजा में शुरू हुए युद्ध के बाद तुर्किये के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन और इज़राइल के बीच मतभेद और गहरे हो गए।
प्रस्ताव के साथ जारी व्याख्यात्मक दस्तावेज में कहा गया है कि व्यापक और स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण होने के बावजूद आर्मेनियाई नरसंहार को लेकर वर्षों से इनकार और तथ्यों को कमतर दिखाने का संगठित अभियान चलाया जाता रहा है। इसमें विशेष रूप से इतिहास की पुस्तकों को बदले जाने और घटनाओं की अलग व्याख्या प्रस्तुत किए जाने का भी उल्लेख किया गया है।
प्रस्ताव में कहा गया है कि आर्मेनियाई लोगों के खिलाफ हुए अत्याचारों को इतिहास के आधार पर स्वीकार करना आवश्यक है। साथ ही यह भी कहा गया है कि भविष्य में यदि कोई इन घटनाओं को धुंधला करने, कमतर आंकने या अस्वीकार करने का प्रयास करता है, तो उसकी भी निंदा की जानी चाहिए।
आर्मेनियाई समुदाय लंबे समय से 20वीं सदी की शुरुआत में हुई उन घटनाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नरसंहार के रूप में मान्यता दिलाने की मांग करता रहा है। विभिन्न ऐतिहासिक आकलनों के अनुसार उस दौर में लगभग 15 लाख आर्मेनियाई लोगों की मौत हुई थी। वहीं उस्मानी साम्राज्य के उत्तराधिकारी देश तुर्किये का कहना है कि उस समय हुई हत्याओं, गिरफ्तारियों और जबरन विस्थापन को नरसंहार कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है। तुर्किये इस आरोप को लगातार खारिज करता आया है।