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गंगासागर मेलाः पश्चिम बंग भोजपुरी परिषद का 41 वर्षों की सतत मानव-सेवा यात्रा

सेवा किसी औपचारिक दायित्व तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आत्मीयता और उत्तरदायित्व का जीवंत रूप बन जाती है।

By लखन भारती

Jan 11, 2026 12:44 IST

कोलकाताःकोलकाता के बाबुघाट स्थित आउट्राम घाट पर पश्चिम बंग भोजपुरी परिषद द्वारा संचालित गंगासागर तीर्थ यात्री सेवा शिविर का शनिवार को विधिवत उद्घाटन श्रद्धा, गरिमा और सेवा-भाव से ओतप्रोत वातावरण में संपन्न हुआ। यह अवसर परिषद की 41वर्षों से अनवरत चल रही मानव-सेवा की परंपरा का सजीव साक्ष्य बना। यह एक ऐसी परंपरा, जहाँ कर्म साधना का रूप ले लेता है और सेवा जीवन-दर्शन बन जाती है।

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात भजन गायिका प्रतिभा सिंह के माता माई की पचरा गीत से शिविर का कार्यक्रम शुरू हुआ। उनके इस गीत ने उद्घाटन समारोह के वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से आलोकित किया। शिविर का विधिवत उद्घाटन अशोक सिंह द्वारा फीता काटकर किया गया। इस अवसर पर मंच पर जय प्रकाश सिंह (उद्योगपति), अशोक सिंह, संस्थापक बीरेंद्र पाण्डेय, डॉ. राधेश्याम श्रीवास्तव, एडवोकेट शम्भूनाथ राय, अनिल ओझा, प्रतिभा सिंह तथा सभाजीत मिश्र मंचासीन रहे। कार्यक्रम में प्रमोद शुक्ला,राम बख्स सिंह, अरविन्द सिंह, कमल अग्रवाल,उषा मिश्रा एवं साधना मिश्रा विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उनकी गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा और सामाजिक महत्व को और बढ़ाया।

स्वागताध्यक्ष के रूप में डॉ. राधेश्याम श्रीवास्तवने सभी अतिथियों, पदाधिकारियों एवं उपस्थित जनसमूह का आत्मीय स्वागत किया। उन्होंने परिषद द्वारा गंगासागर में वर्षों से किए जा रहे सेवा-कार्यों का उल्लेख करते हुए बताया कि शिविर के माध्यम से तीर्थयात्रियों को निःशुल्क चिकित्सा सुविधा, प्राथमिक उपचार, आवश्यक दवाइयाँ तथा स्वास्थ्य-सहायता उपलब्ध कराई जाती है, ताकि कठिन यात्रा के दौरान किसी भी श्रद्धालु को असुविधा न हो।

अपने संबोधन में सभाजीत मिश्र ने परिषद की 41 वर्षों की सेवा-यात्राका भावपूर्ण और आत्मीय चित्र प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि यह शिविर कोई अस्थायी व्यवस्था मात्र नहीं, बल्कि सेवा-संस्कार की सतत परंपरा है, जहाँ थके हुए यात्रियों को विश्राम, भूखों को भोजन और संकट में पड़े जनों को संबल मिलता है। यही निरंतरता परिषद की पहचान है और यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति भी।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि परिषद आउट्राम घाट के साथ-साथ गंगासागर धाम में भी अपना सेवा-शिविर संचालित करती है। परिषद के लिए गंगासागर केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संस्कृति, आस्था और मानवीय संवेदना का संगम है। यहाँ सेवा के साथ-साथ परिषद भोजपुरी संस्कार, भाषा और अपनत्व को भी जीवंत रखती है। आज आउट्राम घाट हो या गंगासागर धाम, परिषद की पहचान किसी बैनर या प्रचार से नहीं, बल्कि 41 वर्षों की उसकी निःस्वार्थ सेवा और निरंतर उपस्थितिसे होती है।

सर्वश्री वीरेंद्र पाण्डेय, संस्था के संस्थापक ने भोजपुरी भाषा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पश्चिम बंग भोजपुरी परिषद मानव-सेवा के साथ-साथ भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण एवं प्रसार में भी निरंतर सक्रिय भूमिका निभा रही है। उनके अनुसार भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की स्मृति, अस्मिता और सांस्कृतिक चेतना का आधार होती है।

सर्वश्री जय प्रकाश सिंह ने भारतीय समाज में गंगासागर के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह तीर्थ आस्था का ही नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है।

एडवोकेट श्री शम्भूनाथ राय ने अपने विचार रखते हुए कहा कि गंगासागर में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति पहले तीर्थयात्री होता है, यहाँ धर्म और जाति के बंधन स्वतः टूट जाते हैं। परिषद का उद्देश्य भी इसी मानवीय समभाव को व्यवहार में उतारना है।

परिषद से जुड़े कर्मठ कार्यकर्ताओं एवं युवाओं की सक्रिय सहभागिता विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। डॉ. आनंद मिश्र, ओम प्रकाश पंडित, श्याम नारायण सिंह, रणविजय सिंह, कमलेश पाण्डेय, मंटू पाण्डेय, दीना पाण्डेय, राधारमण पाठक,दीनानाथ पाण्डेय, विवेक जायसवाल, कृष्णा पाण्डेय, प्रेम पाण्डेय, मदन पाण्डेय, बलराम मिश्रा सहित अनेक युवा कार्यकर्ता सेवा-व्यवस्थाओं में पूरे समर्पण के साथ जुटे रहे। उनकी निष्ठा और तत्परता यह संकेत देती है कि परिषद की सेवा-परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक सशक्त और जीवंत रूप में हस्तांतरित हो रही है ।

कार्यक्रम का संचालन परिषद-मंत्री आलोक चतुर्वेदी ने किया। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि परिषद के इस सेवा शिविर में थके हुए कदमों को विश्राम मिलता है, बीमार देह को उपचार और अनजान यात्रियों को अपनापन। यह शिविर केवल सुविधा प्रदान करने का स्थान नहीं, बल्कि संवेदना, करुणा और मानवीय रिश्तों का विस्तार है। उन्होंने कहा कि 41 वर्ष कोई छोटा समय नहीं होता। यह धैर्य, निरंतरता और निष्ठा की परीक्षा है और परिषद ने यह यात्रा बिना शोर, बिना दिखावे और बिना थकान के पूरी की है। यही कारण है कि परिषद केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक परिवार की तरह कार्य करती है, जहाँ वरिष्ठ अनुभव देते हैं, युवा ऊर्जा देते हैं और सब मिलकर सेवा को आगे बढ़ाते हैं।

उन्होंने उल्लेख किया कि रामनिवास सिंघानिया चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा प्रदत्त मेडिकल व्यवस्था के सहयोग से परिषद वर्षों से गंगासागर तीर्थ यात्रियों को निःशुल्क चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराती आ रही है। यह सहयोग असंख्य यात्रियों के लिए संबल बना है और परिषद की सेवा-परंपरा को सशक्त आधार प्रदान करता है। परिषद इस मानवीय सहयोग के लिए ट्रस्ट के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करती है।

अपने वक्तव्य के समापन में उन्होंने कहा कि परिषद से जुड़े सेवा-भावी साथी दिन-रात बिना किसी अपेक्षा के व्यवस्थाएँ सँभालते हैं, श्रद्धालुओं की आवश्यकता को अपनी जिम्मेदारी मानते हैं और एक मुस्कान, एक सहारा, एक आश्वस्ति के माध्यम से अजनबियों को अपना बना लेते हैं। न उन्हें प्रशंसा की आकांक्षा होती है, न पहचान की चाह। उनके लिए सेवा ही साधना है और मानव-कल्याण ही सबसे बड़ा पुरस्कार। कुल मिलाकर, आउट्राम घाट पर आयोजित यह उद्घाटन समारोह केवल एक शिविर का आरंभ नहीं था, बल्कि कर्म, करुणा और संस्कृति के संगम का उत्सव था। चार दशकों से अधिक समय से बहती यह सेवा-धारा आज भी उसी श्रद्धा, समर्पण और मानवीय संवेदना के साथ निरंतर प्रवाहित है और यही पश्चिम बंग भोजपुरी परिषद की सबसे बड़ी पहचान और उपलब्धि है।


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