कोलकाताः बांग्ला के लोकप्रिय साहित्यकार मणिशंकर मुखर्जी ‘शंकर’ का शुक्रवार दोपहर 1:12 बजे निधन हो गया। वे 92 वर्ष के थे और पिछले कुछ दिनों से अस्पताल में भर्ती थे। बताया गया है कि वे ब्रेन ट्यूमर से जूझ रहे थे। उनके निधन की खबर मिलते ही साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई। पाठकों, लेखकों और सांस्कृतिक जगत से जुड़े लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। शंकर का जाना केवल एक लेखक का निधन नहीं, बल्कि एक ऐसी रचनात्मक चेतना का अवसान है जिसने दशकों तक बांग्ला साहित्य को दिशा दी।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
मशहूर साहित्यकार शंकर का जन्म 7 दिसंबर 1933 को तत्कालीन पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के यशोहर जिले के वनग्राम में हुआ था। उनके पिता हरिपद मुखोपाध्याय पेशे से वकील थे। उनका बचपन हावड़ा में बीता, जहां उन्होंने जीवन के संघर्ष और साधारण लोगों की दुनिया को करीब से देखा।
युवावस्था में उन्होंने विभिन्न काम किए-कभी अध्यापन, तो कभी कोलकाता हाईकोर्ट के आसपास नौकरी। इन्हीं अनुभवों ने उनके भीतर के लेखक को गढ़ा। जीवन की वास्तविकताओं ने ही उनकी रचनाओं को सजीव और विश्वसनीय बनाया।
साहित्यिक यात्रा: ‘कतो अजानारे’ से लोकप्रियता की ऊंचाइयों तक
जाने माने साहित्यकार शंकर मुखर्जी की साहित्यिक यात्रा ‘कतो अजानारे’ से शुरू हुई। हालांकि ‘चौरंगी’ ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई। इस उपन्यास में महानगरीय जीवन, होटल संस्कृति और मानवीय संबंधों की जटिलताओं को उन्होंने जिस गहराई से उकेरा, उसने पाठकों को नया अनुभव दिया।
इसके बाद ‘सीमाबद्ध’, ‘जन अरण्य’ और ‘आशा आकांक्षा’ जैसी कृतियों ने उन्हें बांग्ला साहित्य के शिखर पर स्थापित कर दिया। उनके लेखन में शहरी मध्यवर्ग का संघर्ष, महत्वाकांक्षा, नैतिक द्वंद्व और समय की विडंबनाएं बार-बार उभरकर सामने आती हैं।
सिनेमा में अमर हुई रचनाएं
लोकप्रिय साहित्यकार शंकर की रचनाओं का प्रभाव साहित्य तक सीमित नहीं रहा। उनके उपन्यास ‘सीमाबद्ध’ और ‘जन अरण्य’ का फिल्म रूपांतरण महान फिल्मकार सत्यजीत रे ने किया। इन फिल्मों ने भारतीय सिनेमा में भी विशेष स्थान बनाया।
‘सीमाबद्ध’, ‘जन अरण्य’ और ‘आशा आकांक्षा’ को मिलाकर प्रकाशित उनकी चर्चित त्रयी ‘स्वर्ग मर्त पाताल’ सत्तर और अस्सी के दशक में अत्यंत लोकप्रिय हुई। इसके संस्करण बार-बार छपते और शीघ्र ही समाप्त हो जाते थे। उस दौर की पीढ़ी इस लोकप्रियता की साक्षी रही है।
किशोर साहित्य में भी प्रिय नाम
शंकर मुखर्जी ने किशोर साहित्य में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। शारदीय आनंदमेला में प्रकाशित उनका लघु उपन्यास ‘पिकलुर कोलकाता भ्रमण’ बाद में ‘खाराप लोकेर खप्पोरे’ नाम से भी जाना गया। इसके साथ अन्य रचनाओं को मिलाकर ‘एक बैग शंकर’ शीर्षक से पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसे पाठकों ने भरपूर सराहा।
उन्होंने किशोर पाठकों के लिए भी ऐसी कहानियां लिखीं, जिनमें रोमांच के साथ जीवन की सीख छिपी होती थी।
स्वामी विवेकानंद पर शोध और लेखन
स्वामी विवेकानंद पर भी शंकर मुखर्जी ने गंभीर शोध और लेखन किया। उनके इस विषय पर लिखे गए ग्रंथों को मूल्यवान और शोधपरक माना जाता है। उन्होंने इतिहास और आध्यात्मिकता को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया।
मुख्यमंत्री ने जताया शोक
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने साहित्यकार शंकर की मृत्यु पर शोक व्यक्त किया है। उन्होंने अपने ‘एक्स’ हैंडल पर शोक संदेश जारी करते हुए कहा कि “ बांग्ला के मशहूर साहित्यकार मणि शंकर मुखर्जी (शंकर) के निधन से वे बहुत मर्माहत हैं। उनके निधन से बांग्ला साहित्य का एक उज्ज्वल नक्षत्र अस्त हो गया।” उन्होंने कहा कि ‘चौरंगी’ से लेकर ‘जन अरण्य’ तक उनकी कालजयी रचनाएं पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेंगी।
मुख्यमंत्री ने स्वामी विवेकानंद पर उनके गहन शोध को भी अमूल्य संपदा बताया और शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की।
समाज का आईना थे शंकर
मशहूर साहित्यकार शंकर की रचनाओं में आम आदमी की पीड़ा, सपने, संघर्ष और महानगर की चमक के पीछे छिपी सच्चाइयां साफ दिखाई देती हैं। उन्होंने समाज को आईना दिखाया-बिना शोर-शराबे के, लेकिन गहरी संवेदना के साथ। उनकी भाषा सरल थी, लेकिन भाव गहरे। वे पाठकों को कहानी के भीतर ले जाते थे और पात्रों के साथ जीने का अनुभव कराते थे।
एक अमिट विरासत
साहित्यकार शंकर अब भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी रचनाएं आने वाली पीढ़ियों को मार्गदर्शन देती रहेंगी। बांग्ला साहित्य और भारतीय सांस्कृतिक जगत में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि शब्द समय को पार कर अमर हो सकते हैं।