नई दिल्लीः कृषि और डेयरी जैसे सेक्टर महज व्यापारिक क्षेत्र नहीं, बल्कि भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। ये क्षेत्र देश के करोड़ों छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका से सीधे जुड़े हुए हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों को बिना सुरक्षा के वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए खोलना किसानों के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता था।
भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिए जाने के साथ ही दोनों देशों की साझेदारी एक कदम और आगे बढ़ गई। इस समझौते की सबसे अहम और राजनीतिक-आर्थिक रूप से संवेदनशील उपलब्धि यह रही कि इसमें भारत के कृषि और डेयरी सेक्टर को विशेष रूप से सुरक्षित रखा गया है। यही पहलू इस पूरे ढांचे में सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला साबित हुआ है।
समझौते के फ्रेमवर्क के ऐलान के बाद केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में डेयरी, फल, सब्जियां, मसाले और अन्य प्रमुख अनाजों को पूरी तरह संरक्षित किया गया है। उन्होंने कहा कि इससे देश के घरेलू किसानों के हित सुरक्षित होंगे, स्थानीय कृषि को दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजारों में से एक तक तरजीही पहुंच मिलेगी और यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक और मजबूत कदम है।
इस अंतरिम समझौते के तहत भारत ने डेयरी, फल, सब्जियां, मसाले और प्रमुख अनाजों को व्यापक टैरिफ रियायतों से बाहर रखा है। यह इसलिए भी अहम है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताओं में कृषि और डेयरी हमेशा से भारत के लिए ‘लक्ष्मण रेखा’ रहे हैं, खासकर अमेरिका जैसे देशों के साथ, जहां बड़े पैमाने पर सब्सिडी प्राप्त कृषि-उद्योग हावी हैं। यदि इन क्षेत्रों को बिना शर्त खोल दिया जाता, तो भारत के वे किसान, जो पहले से ही सीमित संसाधनों और कम आय पर निर्भर हैं, सस्ते आयात और अनुचित प्रतिस्पर्धा के कारण भारी नुकसान झेल सकते थे।
इस मुद्दे का एक बड़ा राजनीतिक पहलू भी है. भारत में कृषि और डेयरी बेहद संवेदनशील राजनीतिक विषय हैं। किसानों की आय और हित किसी भी सरकार के लिए प्रमुख चिंता का विषय रहते हैं। यदि कोई भी बड़ा उदारीकरण किसानों की कमाई को प्रभावित करता है, तो उसका सीधा असर सामाजिक असंतोष और राजनीतिक विरोध के रूप में सामने आ सकता है। यही वजह थी कि भारत ने 2019 में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी यानी आरसीईपी (RCEP) से खुद को अलग कर लिया था। सरकार का मानना था कि सस्ते आयात घरेलू फसलों और डेयरी उत्पादों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
सरकारी सूत्रों ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि भारत ने कृषि और डेयरी को लेकर अपने लंबे समय से चले आ रहे रुख में कोई ढील नहीं दी है। इस अंतरिम समझौते में आयात के जरिये बाजार खोलने के बजाय भारतीय उत्पादों को अमेरिकी बाजार में तरजीही पहुंच देने पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य यह है कि घरेलू किसान और कृषि निर्यातक दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजारों में से एक में बढ़ती मांग का लाभ उठा सकें, बिना स्थानीय उत्पादन और खाद्य सुरक्षा को खतरे में डाले।
यह रणनीति सरकार की उस व्यापक नीति के अनुरूप है, जिसमें निर्यात आधारित विकास को बढ़ावा देने के साथ-साथ घरेलू हितों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जा रही है। यानी पहले देश की क्षमता को मजबूत करना और फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था से अपने शर्तों पर जुड़ना।
वैश्विक हालात के लिहाज से भी यह कदम बेहद जरूरी माना जा रहा है। मौजूदा दौर में वैश्विक सप्लाई चेन दबाव में हैं, भू-राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ रही है और कई देश संरक्षणवाद की ओर लौट रहे हैं। ऐसे समय में भारत का अपने संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षित रखते हुए अमेरिका जैसे बड़े साझेदार के साथ व्यापारिक रिश्तों को आगे बढ़ाना एक संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। जल्दबाजी में बड़े समझौते करने के बजाय इस अंतरिम ढांचे के जरिये दोनों देशों के बीच भरोसा बनाने और भारत के मूल हितों को सुरक्षित रखने की कोशिश की गई है।
कृषि और डेयरी की सुरक्षा के जरिये यह समझौता आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को जमीनी स्तर पर मजबूती देता है। इसका संदेश साफ है- पहले घरेलू उत्पादन, किसानों और उद्योगों को सशक्त बनाना, और फिर वैश्विक बाजार से जुड़ना। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया गया है कि भारतीय किसान और कृषि आधारित उद्योग वैश्विक व्यापार के अवसरों से पूरी तरह कटे न रहें, बल्कि उन्हें धीरे-धीरे, लक्षित और टिकाऊ तरीके से अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ा जाए।
कुल मिलाकर, भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौता न सिर्फ़ रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि भारत वैश्वीकरण के दौर में अपने किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कीमत पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं है।