नई दिल्ली : 2 अप्रैल 2025 से 2 फरवरी 2026 तक, अमेरिका का ट्रंप टैरिफ भारत पर 306 दिनों तक लागू रहा। लेकिन पिछले सोमवार को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर लगाए गए इस शुल्क को घटाने की घोषणा की, जिससे इस भारी बोझ के ऊपर अचानक बहुत सारी अनिश्चितताएं पैदा हो गई।
क्या पोटास कृषि और डेयरी जैसे विवादित कई क्षेत्रों समेत व्यापक व्यापारिक समझौते की ही बात कर रहे हैं? अगर दोनों देशों के बीच समझौता सच में हो गया है, तो फिर उसके फाइन प्रिंट्स के बारे में नई दिल्ली चुप क्यों नहीं है? सवाल बहुत हैं, लेकिन संबंधित अधिकारियों के पास कोई सटीक जवाब नहीं था।
विरोधियों के लगातार हमलों के बीच अटकलें और बढ़ गईं। पिछले कुछ दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या उनकी सरकार ने हवा में ही बातों–बातों में समझौते का जिक्र किया, लेकिन इस बारे में किसी ने भी स्पष्ट रूप से कुछ नहीं बताया। अंततः इस समस्या को केंद्रीय उद्योग–व्यापार मंत्री पीयूष गोयल ने सुलझाया। उनके अनुसार अगले 4–5 दिनों के भीतर दोनों देशों की ओर से संयुक्त बयान जारी किया जाएगा। उसके बाद राष्ट्रपति ट्रंप कार्यकारी आदेश जारी करके भारत पर लागू 18% शुल्क घटा देंगे। इसी के आधार पर पहला चरण का व्यापार समझौता मार्च के मध्य में हस्ताक्षरित होगा।
हालांकि भारत पर ट्रंप टैरिफ का बोझ कम हो जाएगा, लेकिन समझौते पर हस्ताक्षर होने से पहले अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क में कोई कटौती नहीं की जा रही है, यह भी बृहस्पतिवार को केंद्रीय मंत्री ने बताया।
उनके अनुसार दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व ने व्यापार समझौते पर जो निर्णय लिया है उसे लागू करने के लिए उच्च स्तरीय बातचीत जारी है। द्विपक्षीय व्यापार समझौते का पहला चरण लगभग अंतिम रूप में है। हमें उम्मीद है कि अगले 4–5 दिनों में इस पर संयुक्त बयान जारी कर पाएंगे। साथ ही उन्होंने कहा कि समझौते से संबंधित सरकारी कानून और कागजी कार्रवाई की तैयारी शुरू हो गई है, लेकिन इसे पूरा करने में थोड़ा समय लगेगा। इसलिए हमारी उम्मीद है कि मार्च के मध्य तक इसमें हस्ताक्षर हो सकेंगे।
भारत की ओर से अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क घटाने में देरी क्यों हो रही है, इसका भी केंद्रीय व्यापार सचिव राजेश अग्रवाल ने विवरण दिया। उनके अनुसार नई दिल्ली ने जो शुल्क लगाया वह ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन टैरिफ’ श्रेणी में आता है जिसे हटाने के लिए समझौते पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर करना आवश्यक है।
हालांकि यह नहीं कहा जा सकता कि मंत्री ने सारी भ्रम की स्थिति खत्म कर दी। उन्होंने कहा कि अगले 5 वर्षों में भारत के आयात का आंकड़ा 1.80 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा। जिसमें लगभग 45 लाख करोड़ रुपये वाशिंगटन को जाएगा। पीयूष गोयल का कहना है कि ऊर्जा, विमानन, डेटा सेंटर और परमाणु ऊर्जा समेत कई क्षेत्रों में विस्तार और क्षमता बढ़ाकर भारत विकासशील देश से विकसित देश की ओर बढ़ रहा है। और इन क्षेत्रों में अमेरिका विश्व में पहले नंबर पर है इसलिए उनके साथ व्यापार बढ़ाए बिना इसे संभव नहीं किया जा सकता।
हालांकि बाजार विशेषज्ञों का एक हिस्सा मानता है कि यह लक्ष्य लगभग असंभव है। उनका कहना है कि वर्तमान में भारत के बाजार से 5.41 लाख करोड़ रुपये अमेरिकी कंपनियों के पास जाते हैं। इसे बढ़ाकर 9 लाख करोड़ तक ले जाना कठिन कल्पना ही है। साथ ही अगर इसी दर से अमेरिका के साथ व्यापार बढ़ाया गया, तो यूरोपीय संघ या रूस जैसे अन्य पुराने व्यापारिक साझेदारों के साथ द्विपक्षीय संबंध खराब हुए बिना यह करना मुश्किल होगा। इसलिए आने वाले दिनों में मोदी सरकार किस हद तक यह लक्ष्य हासिल कर पाती है, उस पर सभी की नजर रहेगी।
स्थिति और जटिल हो सकती है। कुछ बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि अगर रूस से रातों-रात तेल खरीद बंद करने जैसे कठिन निर्णय लिए गए, तो देश में ईंधन की कीमतें बढ़ सकती हैं और महंगाई की स्थिति और गंभीर हो सकती है। क्रेमलिन की ओर से भी बयान आया कि भारत सरकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान के आधार पर रूस से तेल खरीद बंद किया, ऐसा कोई सरकारी संदेश नई दिल्ली से नहीं गया है, इसलिए वे इस पर प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हैं।
दूसरी ओर अमेरिकी कृषि सचिव के पूर्व ट्विटर हैंडल पर किए गए पोस्ट ने भारतीय कृषि क्षेत्र की चिंताएं बढ़ाई। इसमें कहा गया कि इस समझौते से भारत के साथ कृषि क्षेत्र में 11,700 करोड़ रुपये के व्यापार घाटे को समाप्त करने का सुनहरा अवसर मिल गया है। अब देखने वाली बात यह है कि व्यापारिक लाभ–हानि के संतुलन में किसकी पकड़ भारी होगी, जब समझौते की शर्तें सार्वजनिक होंगी। इस नाटक के पर्दे के खुलने में अभी लगभग पांच दिन बाकी है।