राजेश अग्रवाल
नई दिल्ली : 250 ईसा पूर्व से ही यूरोप के साथ भारत के घनिष्ठ व्यापारिक संबंध विद्यमान रहे हैं। प्राचीन समय में भारत में बने मलमल के कपड़े, मसाले और रत्न यूरोप के बाजारों में सबसे बेहतरीन माने जाते थे। उनकी गुणवत्ता और मांग इतनी अधिक थी कि उनका कोई मुकाबला नहीं था। उसी ऐतिहासिक संबंध को आधुनिक स्वरूप देने के उद्देश्य से भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) होने जा रहा है। 2007 में इस पर चर्चा शुरू हुई थी, लेकिन 2013 में यह ठहर गई। हालांकि 2022 से हमारे देश के नेतृत्व के दृढ़ संकल्प के कारण सभी बाधाओं को पार कर यह सार्थक व्यापारिक समझौता पुनः आरंभ हुआ है। इसके माध्यम से लगभग 200 करोड़ लोगों के विशाल बाजार में विश्व जीडीपी के 25 प्रतिशत की हिस्सेदारी सुनिश्चित होगी।
इस समझौते के परिणामस्वरूप भारतीय उत्पादों के 99 प्रतिशत से अधिक निर्यात पर शुल्क समाप्त हो जाएगा। विशेष रूप से वस्त्र, परिधान, चमड़ा उत्पाद, आभूषण तथा समुद्री खाद्य जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को यूरोपीय बाजार में बड़ा लाभ मिलेगा। दूसरी ओर, यूरोपीय कारों या मदिरा जैसे उच्च-मूल्य वाले उत्पादों को भारतीय बाजार में प्रवेश का अवसर मिलेगा, फिर भी घरेलू उद्योगों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है।
सेवा क्षेत्र में भी यह समझौता अभूतपूर्व संभावनाएं लेकर आ रहा है। पेशेवरों की आवाजाही आसान होने के साथ-साथ यूपीआई जैसी भारतीय डिजिटल भुगतान प्रणालियों तथा आयुष चिकित्सकों के लिए यूरोप के द्वार खुलेंगे। हालांकि इस समझौते में केवल लाभ के आंकड़ों पर ही नहीं, बल्कि सतत विकास और पर्यावरणीय संतुलन पर भी समान रूप से जोर दिया गया है। लघु और सीमांत किसानों तथा छोटे उद्योगों के हितों को क्षति न पहुंचे, इसके लिए भारत और ईयू दोनों ने लचीलापन दिखाया है।
(लेखक उद्योग एवं वाणिज्य मंत्रालय के वाणिज्य विभाग के सचिव हैं)