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डिजिटल युग में हिंदी साहित्य की प्रासंगिकता पर उठा सवाल, Gen Z को लेकर विशेषज्ञों की राय, कई मिथक टूटे

Gen Z, डिजिटल दौर और हिंदी साहित्य: कोलकाता पुस्तक मेले में समाचार एई समय के लाइव सेशन में हुई कई खास बातें

By Moumita Bhattacharya

Jan 29, 2026 12:08 IST

हिंदी साहित्य? अरे यह तो बहुत बोरिंग है। साहित्य की किताबें कौन पढ़ता है? अब तो जमाना डिजिटल का है...अक्सर हमने Gen Z पीढ़ी के युवाओं से ये बातें सुनी होंगी। क्या वाकई में Gen Z हिंदी साहित्य से दूर होती जा रही है? क्या साहित्य से जुड़े लोग भी ऐसा ही सोचते हैं? क्या सच में Gen Z पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच एक जेनरेशन गैप आ चुका है जिसे भरा नहीं जा सकता है अथवा उसे भरने का प्रयास ही नहीं किया जा रहा है?

समाचार एई समय की टीम ने इस तरह के कई सवालों का जवाब ढूंढने की कोशिश की। अंतर्राष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेला 2026 में एई समय के स्टॉल (नंबर 198) पर एक विशेष लाइव सेशन का आयोजन किया गया। इस लाइव सेशन में रवींद्रभारती यूनिवर्सिटी के इतिहास के प्रोफेसर व लेखक डॉ. हितेंद्र पटेल और स्कॉटिश चर्च कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर, लेखिका व आलोचक डॉ. गीता दूबे बतौर अतिथि उपस्थित रहे। इस लाइव सेशन का विषय 'Gen Z और हिंदी साहित्य' था।

बता दें, वर्ष 1997 से 2012 के बीच जिन बच्चों ने जन्म लिया उन्हें जेनरेशन Z यानी Gen Z कहा जाता है।

आइए जान लेते हैं कि अतिथियों का Gen Z के साहित्य से जुड़ाव और इस नयी पीढ़ी को समझने व समझाने के बारे में क्या विचार है?

अगर आकांक्षाओं का करें सम्मान तो निकल सकता है बीच का रास्ता

क्या युवा पीढ़ी साहित्य से दूर भागती जा रही है? यह सवाल पूछने पर डॉ. हितेंद्र पटेल ने कहा, "साहित्य हमारी जैविक जरूरत है। हम साहित्य से ही निर्मित होते हैं। जेन जी के लिए प्राथमिक माध्यम इंटरनेट ही है। इनकी शिक्षा भी अब काफी हद तक इंटरनेट पर ही निर्भर हो गया है। मोबाइल से कई तरह के ज्ञान भी प्राप्त कर सकते हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह एक नया समय है। एक भाषा से दूसरी भाषा में आवाजाही अब पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा आसान हो गयी है। सोशल मीडिया पर किसी भी भाषा को ट्रांसलेट कर पढ़ना आसान हो गया है। भाषा की दूरी अब एक तरह से मिट गयी है। लेकिन...!"

उन्होंने आगे कहा, "चिंता की बात यह है कि आज के युवा जो हमारे समाज का सबसे शक्तिशाली हिस्सा हैं उनकी साहित्य से दूरी बन गयी है। या यूं कहिए कि जिसे हम साहित्य समझते थे उससे थोड़ी दूरी बन गयी है। लेकिन हमें कोशिश करनी पड़ेगी कि आज की युवा पीढ़ी साहित्य से जुड़े और नए साहित्य से हम जुड़े। यह प्रयास दोनों ओर से होना पड़ेगा।

हम युवाओं से जुड़े रहे हैं, उनके साथ काम भी करते हैं। उनके नजरिए से देखने की कोशिश भी करते हैं। मैं आशावान हूं कि हमें सफलता भी मिल सकती है। अगर हम समय के सवालों से उनको जोड़े और अपने सवालों को उनके ऊपर न लादे। उनकी आकांक्षाओं का सम्मान करें। उनकी सुविधाओं का ध्यान रखें तो संभव है कि हम कोई एक बीच का रास्ता निकाल सकते हैं।"

चुटकी बजाते ही हर समस्या का समाधान चाहिए

क्या Gen Z का सोशल मीडिया से जुड़ाव साहित्य से उन्हें दूर कर रहा है? इस सवाल का जवाब देते हुए डॉ. गीता दूबे कहती हैं, "आपका सवाल सीधे तौर पर युवाओं और साहित्य दोनों से जुड़ता है। अब सब कुछ त्वरित हो गया है। सिर्फ नूडल्स ही नहीं बल्कि जिंदगी भी अब इंस्टैंट हो गयी है। समस्या आयी और बस चुटकी बजाते ही उसका समाधान चाहिए। आज का युवा जो सोचता है उसे तुरंत सामने रख देता है।

यह तो ऐसी बात हो गयी कि पहले भोजन को कड़ाही में पकाकर उसे प्लेट में सजाकर मेहमानों के सामने परोसा जाता था लेकिन आज का युवा उसे सीधे कड़ाही से खाना पसंद करता है। इससे अभिव्यक्ति बहुत आसान हो गयी है जिसके हाथ में भी स्मार्ट फोन है या सोशल मीडिया के किसी भी प्लेटफार्म तक पहुंच रखने वाला व्यक्ति तुरंत अपने आप को अभिव्यक्त करने की क्षमता रखता है। लेकिन इसकी वजह से परिपक्वता की कमी कई बार खलती है। ताजगी है, रोष है, समर्पण भी है लेकिन भाषाई और वैचारिक परिपक्वता की कमी कई बार थोड़ी दिखाई देती है।"

उन्होंने आगे कहा कि अभिव्यक्ति का विशाल आकाश तो खोल दिया है लेकिन अभिव्यक्ति में थोड़ी परिपक्वता की कमी खलती भी है। जिस तरह हर बात के दो पहलू होते हैं। इस नुकसान के साथ-साथ युवाओं को अब अपनी बात को बेबाकी के साथ बोलने का मौका भी बहुत मिल रहा है जो पहले नहीं था। पहले तो मंच तक ही पहुंचने में वर्षों बीत जाते थे। लेकिन आज कोई भी समस्या खड़ी होती है तो उसके समर्थन या विरोध में सैंकड़ों अन्य आवाजें भी बुलंद होती हैं।

Gen Z अपनी बात को कहने में, उसे दर्ज करवाने में कोई परहेज नहीं करते। जब बच्चे लिखना शुरू करते हैं तब उनमें कई व्याकरणिक अशुद्धियां होती हैं, खुद को अभिव्यक्त कर पाने में परिपक्वता नहीं झलकती। पहले बच्चों को मांजा जाता था ठीक उसी तरह से जैसे हीरे को उसकी असली चमक देने के लिए तराशा जाता है। अब वह मांजने वाला समय समाप्त हो रहा है। इसके दोनों पक्ष हैं - अगर युवाओं को खुद को परिपक्व बनाने के लिए खुद को मांजने का समय नहीं मिल रहा है लेकिन कम से कम आज के युवा बोल तो रहे हैं। इसका स्वागत हमें जरूर करना चाहिए।

जहां हमारी पूरी स्कूली शिक्षा बच्चों को मुंह पर उंगली रख कर बड़ा कर रही है वहां कम से कम अब ये बच्चे बोल तो रहे हैं। Gen Z के पास न सिर्फ प्रश्न पूछने का साहस है बल्कि अगर वह आपसे सहमत न हो तो इसे सीधे कहते भी हैं। परिपक्वता की कीमत पर हम इस बेबाकपन को स्वीकार कर सकते हैं और इसे हमें स्वीकार करना भी चाहिए।

इसी सवाल के जवाब में डॉ. हितेंद्र पटेल ने कहा, "मुझे ऐसा लगता है कि एक समय ऐसा जरूर आएगा जब Gen Z को खुद ही लगेगा कि हमें पहले सीखना चाहिए और खुद को अच्छी तरह से मांजना चाहिए। साहित्य में धैर्य को लाना होगा और विचारों को पकाना पड़ेगा। Gen Z आज जिस तरह से लिख सकते हैं शायद उतने खुलेपन के साथ हम भी नहीं लिख पाते थे। लड़कियां जिस तरह से आगे बढ़ी हैं उसे मैं बहुत ही सकारात्मक नजरिए से देखता हूं। लड़कियों ने खुद को एक्सप्रेस करना शुरू किया है। साहित्य हो या सोशल मीडिया हो...लड़कियों की उपस्थिति से एक तरह का संतुलन आया है।"

विश्वसनीयता को बनाए रखने में सरकार और हमारी दोनों की भूमिका

इंटरनेट की बढ़ती लोकप्रियता ने इसकी विश्वसनीयता को कम कर दिया है? इसका जवाब देते हुए डॉ. पटेल ने कहा, "इंटरनेट हो या उन्माद हो शहरी बच्चों की तुलना में गांवों के बच्चों में थोड़ा ज्यादा है। गांव की Gen Z पीढ़ी सत्यापन की ओर ज्यादा ध्यान नहीं देती। इसलिए जो भी चीजें वायरल होती हैं उनमें से ज्यादातर असली होती ही नहीं है। वह फेक होती है। इसलिए एक माध्यम को अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए प्रयास करने होंगे। इसमें सरकार और हमारा दोनों की बहुत बड़ी भूमिका है।"

उन्होंने आगे कहा कि ज्ञान दो तरह से मिलता है- अकादमीक और लोगों से। हमें यह ध्यान देना होगा कि जो ज्ञान लोकप्रिय हो रहा है उसका अकादमीक ज्ञान से कोई संबंध बन रहा है अथवा नहीं...यह देखना भी बहुत जरूरी है। अन्यथा अर्थ का अनर्थ हो जाएगा। इसलिए अभ्यास, धैर्य और खुलापन सब जरूरी है। Gen Z को हम भले ही बच्चा मानें लेकिन वे खुद को वयस्क मानते हैं।

उन्हें समझने के लिए तैयार होना होगा

Gen Z के बारे में अपने विचारों को व्यक्त करते हुए डॉ. दूबे कहती हैं, "Gen Z को समझाने के लिए हमें उन्हें समझने के लिए भी तैयार होना होगा। भले ही हम अभिभावक के तौर पर हो या शिक्षक के तौर पर हो, अगर हम उनसे यह कह देते हैं कि हमारी राय ही सिर्फ सही है तो वहीं से हमारी असफलता की शुरुआत होगी। इसलिए उन्हें समझने के लिए हमें खुद को तैयार करना होगा।" कुछ ऐसा ही विचार डॉ. हितेंद्र पटेल का भी है।

उन्होंने कहा, "Gen Z को समझना होगा और उनको समझने के लिए खुद को काफी हद तक बदलना पड़ेगा। मैं व्यक्तिगत तौर पर नियमित रूप से 7 घंटे सोशल मीडिया को देता हूं और उसमें से 4-5 घंटे मेरा यह समझने में चला जाता है कि Gen Z आखिर क्या सोच रहे हैं। इससे मुझे फायदा भी हुआ है। Gen Z से संवाद हो सकें, इसके लिए एक मैंने अपनी एक भाषा भी बनायी है।"

AI नयापन नहीं चुरा सकेगा

क्या Gen Z AI के प्रति आसक्त हो रहे हैं? इसके जवाब में डॉ. गीता दूबे ने कहा, "AI सिर्फ वहीं लिख रहा है जो आपने, हमने या दूसरे लेखकों ने लिखकर वहां स्टोर कर दिया है। वह नयी चीजें नहीं सोच रहा है। अगर लेखन ने नए विचार बरकरार रखेंगे, ताजगी बनी रहेगी तो AI आपके उस नयापन को नहीं चुरा पाएगा। लेखकों को अपनी जड़ता से उबरने की जरूरत है।"

वह आगे विश्वास के साथ कहती हैं कि अगर कोई लेखक अपने आसपास के जीवन को परखना छोड़ देंगे, जो कुछ लिखा गया है बस उसी के आधार पर लिखेंगे या नयी चीज को लाने से डरेंगे तो ऐसे लेखकों को AI के सामने झुकना पड़ेगा। AI बस एक मशीन है। यह फीड की गयी चीजों से बस चुरा रहा है। मेधा मनुष्य में है और मेधा की जरूरत होगी ही। AI कृत्रिम है... डरने की जरूरत उसे होनी चाहिए।

साहित्य को समझना और समझाना दोनों जरूरी है

डॉ. पटेल ने साहित्य और Gen Z के बीच की कड़ी को जोड़ते हुए कहा, "दोनों तरफ से प्रयास की जरूरत है। साहित्य का मर्म सिर्फ समझाना नहीं है। उनको समझाना भी है और समझना भी है। इन दोनों के बीच में अगर हम साहित्य को रख पाएं तो मुझे नहीं लगता है कि बच्चे नहीं पढ़ेंगे। मैं काफी नए लोगों को पढ़ रहा हूं लेकिन वे बहुत अच्छा लिख रहे हैं।

हां, शायद उतना नहीं जितने की हम उम्मीद करते या अभ्यस्त हैं लेकिन वे अगर लिखते रहेंगे तो अच्छा लिखने की चाह उनमें पैदा हो सकती है। पहले हम उनको साहित्य से जोड़ते हैं और उनका आत्मविश्वास बढ़ाएं तो मुझे लगता है कि हमारा भविष्य बेहतर हो सकता है।"

वह आगे कहते हैं कि हम जिस संकीर्णता का शिकार थे उससे Gen Z हट चुके हैं। उनमें काफी खुलापन है। बांग्लाभाषी जो Gen Z हैं, उन्हें भी पता है कि किसी हिंदीभाषी प्रदेश में क्या घट रही है? हिंदीभाषी लोग भी बांग्लाभाषी लोगों से जुड़ रहे हैं। दुनिया खुल गयी है और मन भी...। ऐसे में किताबों के लिए भी जगह बनानी होगी। हमें चीजों को ऐसे रखना होगा जिससे Gen Z को लगे कि हां, उनके बारे में बात हो रही है।

अगर आज हम प्रेम के बारे में ही कुछ लिखते हैं तो हम अपनी जवानी के दिनों की याद में लिखते हैं लेकिन आज का जो जवान है वह अलग है। वह प्रेम में 10 साल की यातना नहीं सहना चाहता है। वह हर पल को जीना चाहता है। पुस्तकें हमारे जीवन का आधार है और इसे मैं भोजन और सांस लेने की तरह ही महत्वपूर्ण मानता हूं और मुझे पूरा विश्वास है कि Gen Z भी इसे जल्द ही समझने लगेंगे...बस थोड़ा इंतजार किजीए।

डिजिटल लाइब्रेरी को स्वीकार करने की जरूरत

डॉ. गीता दूबे कहती हैं कि Gen Z अब साल में 100-75 किताबें पढ़ने का लक्ष्य बनाती है। तो जरा सोचिए वे घर में या 150-500 किताबें कहां रखेंगे? तो डिजिटल लाइब्रेरी को हमें उस पूरी व्यवहारिकता के साथ स्वीकार करने की जरूरत है।

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रिकॉर्ड 32 लाख पाठकों संख्या के साथ संपन्न हुआ कोलकाता पुस्तक मेला

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