पिछले 2 महीनों से नहीं मिला है वेतन। यह आरोप लगाते हुए अचानक ही बांकुड़ा जिले के एलिफैंट मैनेजमेंट कर्मचारियों ने हड़ताल बुलायी है। इस वजह से कल से शुरू होने जा रही माध्यमिक के परीक्षार्थियों का जीवन एक प्रकार से संकट में आ गया है। क्यों? एलिफैंट मैनेजमेंट कर्मचारियों का माध्यमिक के परीक्षार्थियों से क्या लेना-देना है? आखिर क्यों इन विभाग के कर्मचारियों की हड़ताल ने माध्यमिक के परीक्षार्थियों की किस्मत दांव पर लगा दी है?
दरअसल, बांकुड़ा एक जंगल प्रधान जिला है। इसके काफी स्कूल ऐसे हैं, जहां तक पहुंचने के लिए छात्र-छात्राओं को हाथियों के इलाकों से होकर आवाजाही करनी पड़ती है।
कहा जा सकता है कि उन्हें एलिफैंट कॉरिडोर से होकर आना-जाना पड़ता है। एलिफैंट मैनेजमेंट के कर्मचारी ही इतने सालों से परीक्षा के समय हाथियों को संभालते थे ताकि परीक्षार्थियों की सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सकें। इस बार माध्यमिक की परीक्षा से ठीक एक दिन पहले उन्होंने हड़ताल की घोषणा की है। इसके बाद ही सवाल उठ रहा है कि अब हाथियों को कौन संभालेगा?
बता दें, बांकुड़ा जिले में इस बार माध्यमिक के परीक्षार्थियों की संख्या 48,998 है। इनमें से बड़ी संख्या में परीक्षार्थी जंगलमहल में रहने वाले हैं। जंगलों से घिरे विभिन्न इलाकों में मौजूद स्कूलों में परीक्षा देने के लिए परीक्षार्थी आते हैं। वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार इस इलाके में 33 जंगली हाथी हैं।
एलिफैंट मैनेजमेंट के 50-55 कर्मचारी मिलकर ही इस इलाके में हर साल हाथियों को संभालने का काम करते हैं। इस विभाग में ही कार्यरत दीपक बडू, रामेश्वर हांसदा आदि ने मीडिया को बताया कि पिछले 10-15 सालों से भी अधिक समय से वे एलिफैंट मैनेजमेंट के काम में शामिल हैं। उनका आरोप है कि उनसे 30 दिनों का काम करवाकर प्रतिदिन ₹330 के तौर पर मात्र 17 दिनों का वेतन दिया जाता है। लेकिन यह वेतन भी गत दिसंबर से नहीं दिया गया है।
दीपक बडू का कहना है कि हमारी दो मांगे हैं। हर महीने 26 दिनों का वेतन देना होगा। उस हिसाब से ही दिसंबर और जनवरी का वेतन देना होगा। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि वन विभाग के रेंजर और डिएफओ को बार-बार लिखित आवेदन करने के बावजूद किसी ने कोई कदम नहीं उठाया।
उनका कहना है कि जब तक 26 दिनों का वेतन नहीं दिया जाता है तब तक यह आंदोलन चलता रहेगा। तब तक हड़ताल जारी रहेगी। वहीं रामेश्वर हांसदा का कहना है कि जब भी हाथियों को भगाने के लिए हमें बुलाया जाता है, हम तभी जाते हैं। लगभग 24 घंटा ही हम ड्यूटी पर तैनात रहते हैं। लेकिन ये लोग सोए रहते हैं। हमारा परिवार अब नहीं चल पा रहा है।