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कैसे 83 साल बाद बंगाल में लौटी हिंदुत्व की राजनीति ?

बंगाल के चुनावी नतीजे ऐतिहासिक चक्र पूरा होने की निशानी है। 1941 में शुरू हुई हिंदुत्व की राजनीति न सिर्फ लौटी, बल्कि पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता के शिखर पर पहुंची है।

By लखन भारती

May 05, 2026 16:58 IST

कोलकाताः1941 में फजलुल हक के नेतृत्व में कृषक प्रजा पार्टी और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की हिंदू महासभा ने मिलकर 'प्रोग्रेसिव कोएलिशन' की सरकार बनाई थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी उस सरकार में वित्त मंत्री बने थे। यह सरकार 1943 तक चली और हिंदू-मुस्लिम एकता का एक प्रयोग थी। इसके बाद बंगाल में कांग्रेस, वाममोर्चा और TMC की सत्ता रही। अब 2026 में बीजेपी की जीत के साथ 83 साल बाद फिर से हिंदुत्व की राजनीति सत्ता में लौटी है। यह क्या कमाल करेगी और फायदा क्या है ?

इतने लंबे वक्त के बाद हिंदुत्व की राजनीति की वापसी किसी एक वजह से नहीं, बल्कि कई सामाजिक-राजनीतिक वजहों का नतीजा है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के इस सपने को PM मोदी ने ‘आत्मा की शांति’ बताया।

हिंदू वोटों का ऐतिहासिक ध्रुवीकरण: यह बीजेपी की जीत का सबसे अहम स्तंभ रहा। पार्टी ने जातिगत और क्षेत्रीय पहचानों से ऊपर उठकर हिंदू मतदाताओं को एक बड़े चुनावी गठबंधन के रूप में एकजुट किया। 2021 से 2026 के बीच बीजेपी का वोट शेयर 7 प्रतिशत बढ़ा, जबकि TMC का लगभग इतना ही गिरा। राज्य का हर दसवां हिंदू मतदाता TMC से हटकर बीजेपी के पाले में आ गया। बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी ने भी कहा कि 'हिंदू महिलाओं और आदिवासी समुदायों' से मिले मजबूत समर्थन ने इस जीत का आधार तैयार किया।

RSS का जमीनी अभियान: यह बदलाव महज चुनावी रणनीति का नहीं, बल्कि RSS के दशकों के सामाजिक अभियान का नतीजा है। संघ ने पारंपरिक जातीय विभाजनों को खत्म कर एक साझा हिंदू चेतना विकसित की। इसके लिए 243 विधानसभा क्षेत्रों में 2 लाख से ज्यादा 'लोकमत परिष्कार' बैठकें कीं, जिसमें 14 सहयोगी संगठनों ने हिस्सा लिया। रामनवमी जैसे त्योहारों को सामूहिक पहचान बनाया गया और चुनाव को 'बंगाली हिंदुओं के लिए अस्तित्व की लड़ाई' बताया।

बाहरी परिस्थितियों का प्रभाव: बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद हिंदुओं पर हो रहे कथित अत्याचारों और जमात-ए-इस्लामी के प्रभाव से उपजी आशंकाओं ने सीमावर्ती जिलों में एक गहरी असुरक्षा की भावना पैदा की। इसने हिंदू मतदाताओं को और भी मजबूती से बीजेपी के पक्ष में एकजुट करने का काम किया।

बंगाल की सांस्कृतिक दिशा में बदलाव

एक्सपर्ट्स का मानना है कि बीजेपी की यह जीत दर्शाती है कि उसका हिंदी पट्टी वाला हिंदुत्व अब बंगाली हिंदू मानस पर हावी हो गया है। यह TMC पर उस हमले की सफलता को भी दिखाता है जिसमें पार्टी पर 'हिंदू-विरोधी' और 'तुष्टीकरण' की राजनीति करने का आरोप लगाया गया था। पूर्वी भारत में बीजेपी के हिंदुत्ववादी प्रोजेक्ट का यह अंतिम बड़ा गढ़ था। इसके गिरने से राज्य की सांस्कृतिक और राजनीतिक दिशा में एक नए अध्याय की शुरुआत होगी।

राष्ट्रीय राजनीति और संघीय ढांचे पर दबाव

इस जीत के साथ, बिहार, ओडिशा और असम के बाद अब बंगाल में भी बीजेपी का शासन हो गया, जिससे PM मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का 'मिशन ईस्ट' पूरी तरह कामयाब हो गया। राष्ट्रीय स्तर पर इस जीत को हिंदुत्ववादी परियोजना के केंद्रीकरण के एजेंडे के लिए एक बड़ी मजबूती के रूप में देखा जा रहा है। यह जीत 'हिंदू वोट समेकन' को एक ऐसे सफल चुनावी मॉडल के रूप में पहचान दे रही है जो अन्य राज्यों में भी बीजेपी के लिए रास्ता खोल सकता है।

नागरिकता और जनसांख्यिकी पर बहस का नया दौर

चुनाव के दौरान मतदाता सूचियों के SIR के तहत 91 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए। अमित शाह के घुसपैठियों को बंगाल की धरती से हटाने वाले बयानों ने नागरिकता और अवैध प्रवासन के मुद्दे को तूल दे दिया। जो आने वाले दिनों में राज्य की राजनीति का केंद्र बिंदु होगा।

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