अपने इलाकों को बचाकर दूसरे इलाकों पर अपना कब्जा करने का बोझ प्रदेश भाजपा पर डाला गया था लेकिन ऐसा करते हुए देखा गया कि अपने इलाकों की नींव ही हिलने लगी है। इसलिए अब बंगाल में भाजपा के विधायकों को नया आदेश दिया गया है - अगर खुद जिंदा बचोगे तो पार्टी को याद रखा जाएगा! यानी अब प्रदेश भाजपा के नेता नए इलाकों में अपना विस्तार करने के बजाए फिलहाल अपने-अपने इलाकों की नींव को मजबूत करने पर ध्यान दें।
विधायकों की प्रवास योजना
भाजपा ने राज्य के विधानसभा क्षेत्रों को कई श्रेणियों में बांटा है। अभी बंगाल में 65 विधानसभा क्षेत्र उनके नियंत्रण में हैं। इसके अलावा उन्होंने 100 और सीटों को 'पोटेंशियल' सीटों के तौर पर चिह्नित किया है। पार्टी के केंद्रीय नेताओं के मुताबिक इन सीटों को भाजपा का गढ़ बनाना बहुत मुश्किल नहीं है। बस योजनाबद्ध तरीके से निगरानी करने की जरूरत है। और उस योजना को तैयार करने के लिए प्रदेश भाजपा के विधायकों को मैदान में उतारा गया है - इस पहल को 'विधायकों की प्रवास योजना' का नाम दिया गया है।
पार्टी के केंद्रीय पर्यवेक्षकों ने तय किया था कि हर भाजपा विधायक जनवरी और फरवरी में एक 'पोटेंशियल' विधानसभा केंद्र में दो रातें रुकेगा। वहां वे स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं से मिलेंगे, इलाके के लोगों की भावनाओं को समझेंगे और उसी के आधार पर भाजपा का गढ़ बनाने की योजनाएं बनायी जाएंगी। इतना ही नहीं भाजपा के केंद्रीय मंत्रीयों ने विधायकों से यह भी कहा था कि उन्हें नियमित तौर पर यह देखना होगा कि उन विधानसभा केंद्रों में सभी काम योजनाओं के मुताबिक हो रहा है या नहीं। यानी हर विधायक को अपने इलाके के अलावा एक और विधानसभा केंद्र की जिम्मेदारी उठानी होगी।
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अपना गढ़ मजबूत बनाएं विधायक
2 दिनों पहले ही अचानक दिल्ली से भाजपा विधायकों के लिए नई दिशा-निर्देश भेजी गयी है। इसमें साफ कहा गया है कि उन्हें अपने ही विधानसभा क्षेत्र में पूरी ताकत से लड़ना होगा। यानी, फरवरी में भाजपा के विधायकों 'प्रवास कार्यक्रम' रद्द कर दिया गया है। दक्षिण बंगाल के भाजपा विधायक ने बताया कि कहा गया है कि हमें किसी दूसरे विधानसभा क्षेत्र से चुनाव नहीं लड़ना है। अब से हमें अपनी सीट बचाने पर ही पूरा ध्यान केंद्रीत करना होगा।'
उक्त विधायक ने बताया कि मुझे एक ऐसी सीट की जिम्मेदारी दी गई थी जो 2021 के विधानसभा चुनाव में बहुत कम अंतर से हारी थी। मैं जनवरी में दो दिन के लिए वहां था। फरवरी में भी संगठन के काम से वहां जाने की बात तो थी लेकिन अब मुझसे कहा जा रहा है कि मुझे वहां अब और नहीं जाना पड़ेगा। अभी के लिए मुझे बस अपने ही काम पर ध्यान देना है। मैं जिस केंद्र से विधायक हूं वहीं मुझे पक्के तौर पर भाजपा का गढ़ बनाने के लिए कहा गया है।
अचानक रणनीति में क्यों हुआ बदलाव?
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि इस बात का कोई पक्का भरोसा नहीं है कि इस बार हम अपनी सभी सीटें जीतेंगे। हारी हुई सीटों पर कब्जा करते-करते कहीं जीती हुई सीटें भी हार जाएंगे! शुरुआत से ही यह डर तो था लेकिन समय के साथ अब यह और भी गहराने लगा है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पार्टी के कुछ नेताओं ने विधानसभा चुनाव के मद्देनजर विधायकों पर अतिरिक्त केंद्रों की जिम्मेदारी का बोझ डाल देने के फैसले का शुरुआत से ही विरोध किया था।
कई भाजपा विधायकों ने भी अपने करीबी लोगों के बीच इस मुद्दे पर अपना गुस्सा जाहिर किया था। लेकिन केंद्रीय नेताओं के गुस्से के डर से उनमें से किसी ने भी सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहा। प्रदेश भाजपा के विधायकों ने 'प्रवास प्रोग्राम' योजना के रद्द हो जाने की वजह से फिलहाल चैन की सांस ली है। उत्तर बंगाल के एक भाजपा विधायक ने इस बारे में कहा कि हमारे अपने चुनावी क्षेत्र में ही दिक्कतें खत्म नहीं हो रही हैं। संगठन में कई तरह की मुश्किलें हैं। यह सब संभालने के बाद हमें पार्टी संगठन की कमियों को ठीक करने के लिए दूसरे विधानसभा क्षेत्रों में भागना पड़ रहा था। कार्यक्रम रद्द हो गया है और हम भी बच गए हैं।