हुगलीः देश की सर्वोच्च अदालत में ममता बनर्जी पहली बार दलीलें नहीं दे रही हैं। वह पहले भी वकील और लिटिगेंट के रूप में कई बार अदालतों में खड़ी हुई हैं। उनके कानूनी संघर्ष की शुरुआत बालुरघाट और चुंचुड़ा जिले से हुई थी। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में पेश होने की घटना ने उन पुरानी यादों को ताजा कर दिया।
बालुरघाट की यादें – 10 फरवरी, 1994
करीब तीन दशक पहले, 10 फरवरी 1994 को ममता बनर्जी बालुरघाट जिला अदालत में दलीलें देने गई थीं। उस समय कुमारगंज में छात्र आंदोलन के दौरान हिंसा हुई थी। पुलिस ने कथित तौर पर अंधाधुंध फायरिंग की थी, जिसमें छात्र पार्थ सिंह की मृत्यु हो गई और तीन अन्य घायल हुए।
ममता ने उस घटना की जानकारी मिलते ही 5 फरवरी 1994 को पार्थ सिंह के परिवार से मुलाकात की और जिला नेतृत्व को साथ लेकर उनका समर्थन किया। इसके बाद 9 फरवरी को हिली में पार्टी नेताओं से पूछा गया कि क्या गिरफ्तार आरोपियों को जमानत मिली है। बेल न मिलने की खबर मिलने के बाद ममता अगले दिन 10 फरवरी को बालुरघाट जिला अदालत पहुंचीं। उनके साथ उस समय राज्य के पूर्व पब्लिक वर्क्स मंत्री शंकर चक्रवर्ती, बालुरघाट जिला अदालत के पूर्व सरकारी वकील सुभाष चाकी और वरिष्ठ वकील मन्मथ घोष भी थे।
चुंचुड़ा कोर्ट की घटना – 6 जुलाई, 1997
6 जुलाई 1997, रथ यात्रा के दिन, हुगली के गुप्तीपारा में स्थानीय व्यापारियों और पुलिस के बीच झगड़ा शुरू हुआ। हंगामा इतना बढ़ गया कि पुलिस ने फायरिंग की। गुप्तीपारा लालपुकुर इलाके के हलधर मंडल और बुरो बाग को गोली लगी। हलधर मंडल की मौत हो गई।
तत्कालीन विपक्षी नेता ममता बनर्जी अगले दिन गुप्तीपारा पहुंचीं और मृतक के परिवार से मुलाकात की। उन्होंने रथ रोड पर एक छोटी सभा आयोजित की और सीधे चुंचुड़ा जिला अदालत पहुंचीं। पुलिस द्वारा मृतक हलधर मंडल का शव चुंचुड़ा में अंतिम संस्कार करने की खबर मिलते ही ममता बनर्जी पीड़ित परिवार के साथ खड़ी हुईं और अदालत में बहस की। उस दिन उन्हें काला गाउन पहने देखा गया।
तृणमूल नेता और साथी वकील सुभाष चाकी ने कहा, “यह हमारे लिए गर्व की बात है कि ममता बनर्जी ने 1994 में बालुरघाट जिला अदालत में आम आदमी के लिए पहली बार काला गाउन पहनकर लड़ाई लड़ी थी। आज वह फिर देश की सबसे बड़ी अदालत में आम आदमी के लिए लड़ रही हैं। यह साबित करता है कि वह हमेशा आम जनता के हित में कदम उठाने के लिए तैयार हैं।”
बालुरघाट जिला अदालत के वरिष्ठ वकील मन्मथ घोष ने याद करते हुए कहा, “करीब 32 साल पहले कुमारगंज केस में आंदोलनकारियों की तरफ से कानूनी लड़ाई में ममता बनर्जी हमारे साथ थीं। बालुरघाट बार एसोसिएशन की लाइब्रेरी में रणनीति तैयार करने के बाद स्वर्गीय नीलकांत बागची की लीडरशिप में सवाल-जवाब सत्र आयोजित किया गया था। उनके संघर्ष और समर्पण की कहानी आज भी प्रेरणादायक है।”