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सिंगूर में चुनावी शोर, हकीकत में बेरोजगारी और बंजर जमीन

BJP के उद्योग दावे जमीन पर बेअसर, स्थानीय लोगों में नाराजगी।

By प्रदीप चक्रवर्ती, Posted by: श्वेता सिंह

Jan 18, 2026 15:17 IST

सिंगूरः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के सिंगूर आ रहे हैं। जिस सिंगूर ने कभी औद्योगिक विकास के सपने देखे थे, लेकिन वहां की जमीन आंदोलन की आग में जलती रही। वही सिंगूर एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है। प्रधानमंत्री यहां एक बड़ी जनसभा को संबोधित करेंगे और कई सरकारी परियोजनाओं का उद्घाटन व शिलान्यास करेंगे। प्रशासन और BJP इसे ऐतिहासिक सभा बनाने की तैयारी में जुटे हैं। हकीकत में माहौल उतना उत्साहजनक नहीं दिखता। सिंगूर के लोगों को इस दौरे से उम्मीद कम ही है। लोग असमंजस में हैं।

प्रधानमंत्री के दौरे से पहले गोपालनगर इलाके में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। सभा स्थल और आसपास के पूरे क्षेत्र को सुरक्षा घेरे में ले लिया गया है। SPG के अधिकारियों ने मंच और उसके आसपास की जिम्मेदारी संभाल ली है। प्रधानमंत्री के तय कार्यक्रम के अनुसार, वे रविवार दोपहर सिंगूर में बनाए गए अस्थायी हेलीपैड पर उतरेंगे और वहां से सीधे सभा स्थल पहुंचेंगे। प्रशासनिक स्तर पर इसे हाई-सिक्योरिटी इवेंट माना जा रहा है।

सभा को सफल बनाने के लिए BJP ने पूरी ताकत झोंक दी है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता पहले ही सिंगूर पहुंच चुके हैं। बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे सिंगूर के एक होटल में ठहरे हुए हैं, जबकि कई कार्यकर्ता और नेता अस्थायी टेंटों में रह रहे हैं। रविवार सुबह कामारकुंडू से सभा स्थल तक बाइक रैली निकाली जा रही है। पार्टी का दावा है कि यह सभा रिकॉर्ड भीड़ जुटाएगी और पूरे राज्य में चुनावी माहौल बनाएगी।

BJP के शीर्ष नेताओं ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि यह सभा सिर्फ एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं होगी, बल्कि उद्योग और विकास को लेकर बड़ा संदेश दे सकती है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार समेत कई नेताओं ने कहा है कि विधानसभा चुनाव से पहले टाटा की छोड़ी हुई नैनो फैक्ट्री की जमीन पर प्रधानमंत्री की सभा उद्योग के लिए एक प्रतीकात्मक कदम हो सकती है। BJP का दावा है कि अगर पार्टी राज्य में सत्ता में आती है, तो टाटा को दोबारा सिंगूर लाया जाएगा और पश्चिम बंगाल में औद्योगिक विकास की नई शुरुआत होगी।

लेकिन सिंगूर के आम लोगों की सोच इससे अलग है। यहां के कई निवासी मानते हैं कि उद्योग के वादे अब सिर्फ चुनावी नारे बनकर रह गए हैं। जयमोल्ला इलाके के रहने वाले तपस पाखीरा एक स्थानीय फैक्ट्री में काम करते हैं। उनका कहना है कि अब सिंगूर के लोग किसी भी राजनीतिक वादे पर आसानी से भरोसा नहीं करते। उनके मुताबिक, “नेता बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन सिंगूर में शायद ही कोई ऐसा हो जो यह माने कि यहां फिर कभी कोई बड़ी इंडस्ट्री लगेगी।”

अलामीन मल्लिक की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। उनके पिता ने कभी उद्योग के लिए अपनी जमीन दी थी। उसी जमीन पर बैठे अलामीन कहते हैं कि सिंगूर का औद्योगिक सपना बहुत पहले टूट चुका है। उनके शब्दों में, “बुद्धदेव भट्टाचार्य के समय जो सपना दिखाया गया था-उद्योग, रोजगार, बच्चों के भविष्य का-वह अब इतिहास बन चुका है। अब कोई उद्योगपति यहां आने का जोखिम नहीं उठाएगा। मोदी यहां चुनाव से पहले माहौल बनाने आ रहे हैं, लेकिन इससे सिंगूर के लोगों की जिंदगी नहीं बदलेगी।”

जयमोल्ला के ही जियाउरुल हक की बातों से भी निराशा ही झलकती है। उन्होंने भी उद्योग के लिए अपनी जमीन दी थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार ने जमीन लौटाने की प्रक्रिया शुरू की। जियाउरुल का कहना है कि कागज मिलने के बावजूद उन्हें अब तक जमीन वापस नहीं मिली है। वे सवाल करते हैं, “जब टाटा जैसी बड़ी कंपनी यहां कामयाब नहीं हो सकी, तो अब कौन आएगा और क्यों आएगा?”

BJP इन आरोपों को सिरे से खारिज करती है। पार्टी के राज्य नेता स्वपन पाल का कहना है कि सिंगूर में न खेती बची और न उद्योग और इसके लिए मौजूदा सरकार जिम्मेदार है। उनका दावा है कि BJP अगर सत्ता में आती है, तो सिर्फ सिंगूर ही नहीं, पूरे पश्चिम बंगाल में उद्योगों की बाढ़ आ जाएगी और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

दिलचस्प बात यह है कि सिंगूर भूमि आंदोलन के कई पुराने नेता आज भी उद्योग के पक्ष में खड़े नज़र आते हैं, लेकिन शर्त के साथ। आंदोलन के प्रमुख चेहरों में रहे महादेव दास कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ आदेश दिया था कि जमीन को खेती योग्य बनाकर किसानों को लौटाया जाए। आज तक उस आदेश को पूरी तरह लागू नहीं किया गया। इसी वजह से उन्होंने बंजर जमीन बहाली कमेटी बनाई है। उनका कहना है कि अगर कोई उद्योगपति सीधे किसानों से सहमति के साथ जमीन खरीदकर उद्योग लगाना चाहता है, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।

सिंगूर भूमि आंदोलन के नेता और फिलहाल गोपालनगर पंचायत के तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष अमिया धारा भी यही दोहराते हैं कि आंदोलन कभी उद्योग के खिलाफ नहीं था। उनका कहना है कि विरोध जबरदस्ती, पुलिस बल और लाठियों के दम पर जमीन छीनने के खिलाफ था, न कि विकास के खिलाफ।

राज्य के मंत्री और आंदोलन के एक अन्य प्रमुख नेता बेचाराम मन्ना भी तृणमूल कांग्रेस का पक्ष रखते हुए कहते हैं कि पार्टी उद्योग विरोधी नहीं है लेकिन किसानों के अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने किसानों का अधिकार वापस दिलाया है और तृणमूल उसी लाइन पर खड़ी है।

इन तमाम बयानों, दावों और आरोपों के बीच सिंगूर आज भी उसी सवाल से जूझ रहा है—न पूरी खेती लौटी, न उद्योग आया। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी की सभा से सिंगूर ही नहीं, बल्कि पूरा पश्चिम बंगाल यह जानना चाहता है कि क्या यह दौरा सिर्फ़ चुनावी भाषण तक सीमित रहेगा या सिंगूर के हालात वाकई में बदलेंगे।

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डनलप के मजदूर निराश, चुनावी मंच तैयार: सिंगूर में मोदी की सभा के बाद क्या हालात बदलेंगे?

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