मुंबईः महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर सियासी आरोप-प्रत्यारोप के केंद्र में है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने राज्य की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि राजनीति में विचारधारा और जनमत की जगह अब पैसे और सत्ता की ताकत हावी हो चुकी है। हाल में संपन्न नगर निगम चुनावों के बाद सामने आ रही घटनाओं को उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरनाक करार दिया।
राउत का कहना है कि जिन पार्षदों को जनता ने किसी दल के टिकट पर चुनकर भेजा, उन्हें सत्तारूढ़ पक्ष की ओर से अपने पाले में लाने की कोशिशें हो रही हैं। उनके अनुसार, यह स्थिति राजनीति को ‘खरीद-फरोख्त’ के स्तर पर ले जा रही है, जहां निर्वाचित प्रतिनिधियों की निष्ठा और वैचारिक प्रतिबद्धता का कोई महत्व नहीं रह गया है। राउत ने इसे “गुलामों का बाजार” बताते हुए संकेत दिया कि मौजूदा राजनीतिक संस्कृति में धनबल सबसे बड़ा हथियार बन गया है।
उन्होंने उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि सत्ता के बल पर वफादारी की नीलामी की जा रही है। राउत ने यह भी कहा कि ऐसी प्रवृत्तियां केवल राज्य स्तर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसके पीछे राष्ट्रीय स्तर की राजनीति का भी प्रभाव है। उनके मुताबिक, दिल्ली से संचालित सत्ता समीकरणों ने राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता और अवसरवाद को बढ़ावा दिया है।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रहे घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए राउत ने कहा कि शरद पवार और अजित पवार के एक साथ नजर आने से भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है, लेकिन हकीकत यह है कि शरद पवार महाविकास आघाड़ी के साथ मजबूती से खड़े हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि अजित पवार ज्यादा समय तक मौजूदा सत्ता व्यवस्था का हिस्सा नहीं रह पाएंगे। राउत के अनुसार, राजनीति में दो विरोधी ध्रुवों के बीच संतुलन बनाकर चलना संभव नहीं होता।
सोलापुर नगर निकाय चुनावों में शिवसेना के दोनों गुटों के साथ आने की अटकलों को राउत ने खारिज करते हुए कहा कि इस तरह का कोई आधिकारिक निर्णय नहीं लिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उद्धव ठाकरे ऐसी किसी रणनीति को मंजूरी नहीं देंगे, हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि कुछ घटनाएं जरूर हुई हैं, जिनकी तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है।
राज्य की व्यापक राजनीतिक स्थिति पर नजर डालें तो राउत के बयान उस असंतोष को दर्शाते हैं, जो विपक्षी दलों में सत्ता पक्ष की रणनीतियों को लेकर गहराता जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नगर निकाय चुनावों के बाद बढ़ी उठापटक आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले गठबंधन राजनीति और दलों के भीतर समीकरणों को और जटिल बना सकती है। राउत के आरोप केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति में बढ़ती अस्थिरता और विश्वास के संकट की ओर भी इशारा करते हैं।