मुम्बई : महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले के नेवासा तालुका स्थित सौंदाला गांव की ग्रामसभा ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए सर्वसम्मति से गांव को ‘जाति-मुक्त’ घोषित करने का प्रस्ताव पारित किया है। इस पहल का उद्देश्य जातिगत भेदभाव, छुआछूत और सामाजिक अन्याय को समाप्त कर समानता आधारित मानवीय समाज की स्थापना करना है।
5 फरवरी को सरपंच की अध्यक्षता में आयोजित ग्राम पंचायत की बैठक में संविधान में निहित समानता, बंधुत्व और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर विस्तृत चर्चा के बाद यह प्रस्ताव पारित किया गया। प्रस्ताव के अनुसार सौंदाला में अब किसी भी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म, पंथ या वंश के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा और सभी नागरिकों को समान माना जाएगा।
ग्रामसभा ने सामूहिक रूप से ‘मेरी जाति-मानव’ की भावना अपनाने का संकल्प लिया। प्रस्ताव में स्पष्ट किया गया है कि सरकारी सेवाएं, जलस्रोत, मंदिर, श्मशान भूमि, स्कूल और सामाजिक कार्यक्रम सहित सभी सार्वजनिक स्थान सभी ग्रामीणों के लिए बिना किसी भेदभाव के खुले रहेंगे।
इसके साथ ही यह भी तय किया गया कि कोई भी ग्रामीण छुआछूत, सामाजिक बहिष्कार या सामाजिक अन्याय को बढ़ावा देने वाली सामग्री न तो प्रसारित करेगा और न ही सोशल मीडिया पर साझा करेगा। उल्लंघन की स्थिति में आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
यह पहल डॉ. भीमराव आंबेडकर, महात्मा ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, राजर्षि शाहू महाराज और महात्मा गांधी के आदर्शों से प्रेरित बताई गई है। सामाजिक कार्यकर्ता प्रमोद जिंझाडे के मार्गदर्शन में तैयार इस प्रस्ताव को शरद बाबूराव अरगड़े ने प्रस्तुत किया और बाबासाहेब मच्छिंद्र बोधक ने समर्थन दिया। प्रस्ताव को राज्य सरकार को भी भेजा गया है।
सरपंच अरगड़े ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में जातीय भेदभाव की जड़ें गहरी हैं और गांव ने इसे पनपने से रोकने का संकल्प लिया है। इससे पहले ग्रामसभा ने विधवाओं से जुड़े भेदभावपूर्ण रीति-रिवाजों के खिलाफ भी प्रस्ताव पारित किया था। गांव में एक विधवा पुनर्विवाह संपन्न हुआ है और अपमानजनक भाषा के प्रयोग पर 13 लोगों से 500-500 रुपये का जुर्माना वसूला गया है।
करीब 25 हजार की आबादी वाले इस गांव में इन प्रस्तावों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए कई स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। गांव की मुख्य आय गन्ने की खेती और दुग्ध उत्पादन से होती है। यह पहल अन्य गांवों के लिए भी मिसाल बन सकती है।