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लक्ष्य यह हो कि प्रतिभा को खोजकर वैज्ञानिक प्रशिक्षण व्यवस्था स्थापित की जाए : पुलेला गोपीचंद

जमीनी स्तर से प्रतिभा खोज, आधुनिक कोचिंग और संस्थागत समर्थन की आवश्यकता।

हम अपने देश की खेल-यात्रा के एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुँच चुके हैं।

दो ‘चिंतन शिविरों’ का हिस्सा बनने का अवसर प्राप्त होने के बाद मैं दृढ़ता से यह कह सकता हूँ कि वर्तमान भारत के खेल जगत में यह सबसे अधिक समयानुकूल और दूरगामी प्रभाव डालने वाली पहलों में से एक है। आज हम अपने देश की खेल-यात्रा के एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुँच चुके हैं-यह ऐसा क्षण है जहाँ सद्भावना, निवेश और प्रेरणा एक ही बिंदु पर इस प्रकार मिल रहे हैं जैसा पहले कभी नहीं देखा गया।

पिछले एक दशक में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत में खेल प्रायः हाशिए की स्थिति से निकलकर मुख्यधारा में आ गए हैं। खेलों के महत्व के बारे में आज एक स्पष्ट राष्ट्रीय जागरूकता दिखाई देती है-न केवल एक प्रतिस्पर्धी क्षेत्र के रूप में बल्कि स्वास्थ्य, अनुशासन और राष्ट्रीय गर्व के माध्यम के रूप में भी।

यदि भारत को 2036 तक ओलंपिक खेलों में शीर्ष 10 देशों की सूची में स्थान प्राप्त करने का दीर्घकालिक लक्ष्य हासिल करना है तो यह समन्वय या एकीकरण अत्यंत आवश्यक है। विश्वस्तरीय खिलाड़ियों को तैयार करने के लिए केवल प्रतिभा पर्याप्त नहीं है बल्कि एक निरंतर और संगठित वातावरण की आवश्यकता होती है जिसमें शामिल हैं-जमीनी स्तर से प्रतिभा की पहचान, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचा, कोचिंग की उत्कृष्टता, प्रतिस्पर्धी अनुभव के अवसर, तथा निरंतर वित्तीय और संस्थागत सहायता।

(लेखक भारतीय बैडमिंटन टीम के मुख्य राष्ट्रीय कोच हैं)

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