आज के जमाने में जहां जल्द फिटनेस पाने के तरीके, शॉर्टकट डाइट और 30-दिन का ट्रांसफॉर्मेशन चैलेंज चल रहा हैं, वहां वास्तविक अनुशासन कई बार इस शोर-शराबे में खो सा जाता है। लेकिन फिटनेस के बारे में कुछ सबसे अच्छी सलाह उन लोगों से ही मिल सकती है जो इसे रोज चुपचाप और नियमित रूप से अपनाते हैं।
देबनील दत्त, कोलकाता के ला मार्टिनियर फॉर ब्वॉयज का एक 16 साल का 11वीं का छात्र, जिसने ताइक्वांडो में पश्चिम बंगाल और भारत का प्रतिनिधित्व किया है। उसका मानना है कि फिटनेस का मतलब हदें पार करना नहीं है। यह रूटीन, संतुलन और मानसिक ताकतों की आदतों के बारे में है जो कक्षा, खेल के मैदान या रोजमर्रा की जिंदगी हर जगह समान रूप से काम करती है।
फिटनेस रूटीन से बनती है सिर्फ प्रेरणा से नहीं
इस युवा एथलीट के लिए फिटनेस मार्शल आर्ट्स के प्रशिक्षण से कहीं ज्यादा है। यह लाइफस्टाइल की बुनियादी आदतों से शुरू होती है: "साफ-सुथरा खाना, पूरी नींद और एक अनुशासित दैनिक रूटीन।"
देबनील का कहना है, "फिटनेस के लिए प्रेरण की जरूरत नहीं होती। इसके लिए स्थिरता यानी नियमित होने की जरूरत होती है।" हाल ही में यह रणनीति काम आई जब उन्होंने बिना किसी खास प्रशिक्षण के एथलेटिक्स में जीत हासिल की। सिर्फ इसलिए क्योंकि उनका शरीर पहले से ही फिट था। वह बताते हैं कि "पहले दिन से ही फिट रहना" आखिरी मिनट की तैयारी से ज्यादा जरूरी था।
अनुशासन से बढ़ता है आत्मविश्वास
देबनील ने महज 2 साल की उम्र से प्रशिक्षण प्राप्त करना शुरू कर दिया था। सालों के प्रशिक्षण ने उसकी सोच को आकार दिया। उसने बताया कि लड़ाइयों में मिली शुरुआती नाकामियों ने उसे मानसिक तौर पर मजबूत बनने में मदद की। धीरे-धीरे अनुशासन ने अनिश्चितता की जगह ले ली और तैयारी से स्वाभाविक रूप से आत्मविश्वास आया।
यह तब साफ हुआ जब उसने पश्चिम बंगाल का प्रतिनिधित्व किया और बेंगलुरु में नेशनल ताइक्वांडो चैंपियनशिप 2026 (VIFA कप) में दो गोल्ड मेडल जीते। 10 और 11 जनवरी को आयोजित हुए इस टूर्नामेंट में बेंगलुरु, कर्नाटक के अलावा इस पूरे भारत की बेहतरीन राज्य टीमों से 1,000 से ज्यादा खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था।
इसमें महाराष्ट्र, गोवा, दिल्ली, पंजाब, गुजरात, तमिलनाडु, केरल, मणीपुर, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश आदि राज्य भी शामिल थे। उसका कहना है कि जीत शायद ही कभी कोई हादसा होती है। उसका मानना है, "आप ज़्यादातर लड़ाइयां प्रशिक्षण के दौरान ही जीत लेते हैं।" साथ ही उसने यह भी कहा कि मानसिक तैयारी उतनी ही जरूरी है जितनी कि शारीरिक अनुकूलता।
मानसिक फिटनेस उतनी ही जरूरी जितनी शारीरिक शक्ति
दबाव में शांत रहना, नतीजों के बजाय विकास को मापना और तैयारी पर भरोसा करना। यह कुछ ऐसी आदतें हैं जिन पर वह सक्रिय रूप से काम कर रहा है। देबनील कहता है, "मैं अपने दिमाग को उसी तरह प्रशिक्षित करता हूं जैसे अपने शरीर को करता हूं।"
संतुलन, न कि बर्नआउट
ताइक्वांडो में बेहतरीन प्रदर्शन करने के बावजूद उसने खुद को कभी एक ही खेल तक सीमित नहीं रखा। अपने स्कूल की क्रिकेट टीम का पूर्व सदस्य और अब अपने स्कूल की फुटबॉल टीम में लेफ्ट विंगर - उसे लगता है कि अलग-अलग खेल खेलने से फुर्ती, टीम वर्क और ढलने की क्षमता बेहतर होती है।
बता दें, देबनील ताइक्वांडो में नेशनल डैन-2 ब्लैक बेल्ट का विजेता है। सियोल में वर्ल्ड ताइक्वांडो हेडक्वार्टर, कुक्कीवोन काउंसिल ने उसे दूसरा डिग्री इंटरनेशनल ब्लैक बेल्ट (डैन-2) दिया है। वह कहता है कि वह सभी खेलों की इज्जत करता है लेकिन उसके अंतर्राष्ट्रीय अनुभव ने उसे इस खेल में अपनी असली पहचान खोजने में मदद की है।
उसने दिसंबर 2025 में 9वीं TIA ओपन इंटरनेशनल ताइक्वांडो चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए कोरिया और नेपाल सहित अलग-अलग देशों के खिलाड़ियों के खिलाफ न सिर्फ शानदार प्रदर्शन किया बल्कि गोल्ड मेडल भी जीता।
क्या है फिटनेस का असली फॉर्मूला?
देबनील का कहना है कि यह सब दो आसान चीजों के बारे में है:
पहला, 'अनुशासन' - हर दिन आना - तब भी जब प्रेरणा न हो और दूसरा, 'नियमित' - प्रक्रिया पर भरोसा करना और बुनियादी बातों को दोहराना।
कोई शॉर्टकट नहीं। रातों-रात कोई जादुई बदलाव नहीं होता। बस धीरे-धीरे आदतें बनानी है। शायद सबसे जरूरी सबक यह है कि फिट रहने का मतलब हर दिन सही काम करना, ज्यादा काम करना नहीं।