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फुटबॉल के महाकुंभ में गोलों की कम, फटती जर्सियों की चर्चा ज्यादा, आखिर वजह क्या है?

चार मुकाबलों में खिलाड़ियों की जर्सी फटने से उठा बवाल, 72 ग्राम की अल्ट्राउइव तकनीक पर सवाल, कंपनी ने दी सफाई

फीफा विश्व कप 2026 में अब तक दर्शकों को रोमांचक मुकाबले, शानदार गोल, उलटफेर और नई तकनीकों का बेहतरीन मेल देखने को मिला है। तीन देशों में आयोजित इस टूर्नामेंट को अब तक के सबसे आधुनिक विश्व कपों में गिना जा रहा है। लेकिन खेल के इस उत्सव के बीच एक ऐसा मुद्दा भी उभरकर सामने आया है, जिसने खिलाड़ियों से लेकर प्रशंसकों और खेल विशेषज्ञों तक का ध्यान खींच लिया है। यह मुद्दा खिलाड़ियों की जर्सियों का है। लगातार कई मैचों में जर्सियां फटने की घटनाओं ने विश्व कप के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

चार मैचों में सामने आई एक जैसी तस्वीर

विश्व कप के शुरुआती चरण से लेकर अब तक चार अलग-अलग मुकाबलों में खिलाड़ियों की जर्सी फटने की घटनाएं दर्ज की गई हैं। सामान्य तौर पर फुटबॉल में जर्सी खींचना, टक्कर होना या खिलाड़ियों के बीच शारीरिक संघर्ष आम बात मानी जाती है, लेकिन इस बार जिस तरह बार-बार जर्सियां फटी हैं, उसने खेल उपकरणों की गुणवत्ता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इन घटनाओं में शामिल खिलाड़ियों को मैच के दौरान जर्सी बदलनी पड़ी। कुछ मामलों में खिलाड़ी कुछ समय तक फटी हुई जर्सी पहनकर खेलते रहे, जबकि बाद में उन्हें नई किट पहननी पड़ी। दिलचस्प बात यह है कि चारों घटनाओं में इस्तेमाल की गई जर्सियां एक ही कंपनी द्वारा तैयार की गई थीं।

दक्षिण कोरिया-चेकिया मैच से शुरू हुई चर्चा

सबसे पहले दक्षिण कोरिया और चेकिया के मुकाबले में यह मामला सुर्खियों में आया। मैच के 25वें मिनट में चेक गणराज्य के मिडफील्डर पावेल सुलच गेंद के साथ आगे बढ़ रहे थे। इसी दौरान दक्षिण कोरिया के एक डिफेंडर ने उन्हें पीछे से रोकने की कोशिश की। खींचतान के दौरान उनकी जर्सी फट गई। हालांकि खेल जारी रहा, लेकिन इस घटना ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया।

उस समय इसे एक सामान्य घटना माना गया, लेकिन बाद में ऐसी ही घटनाएं लगातार सामने आने लगीं।

पैराग्वे के कप्तान की जर्सी भी नहीं बची

अमेरिका और पैराग्वे के बीच खेले गए मुकाबले में विवाद और बढ़ गया। मैच शुरू होने के केवल आठ मिनट बाद पैराग्वे के कप्तान और डिफेंडर गुस्तावो गोमेज की जर्सी एक तरफ से लगभग पूरी तरह फट गई। अमेरिकी फॉरवर्ड फोलारिन बालोगन के साथ संघर्ष के दौरान उनकी जर्सी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई।

गोमेज ने कुछ समय तक फटी हुई जर्सी को शॉर्ट्स में दबाकर खेल जारी रखने की कोशिश की, लेकिन अंततः उन्हें मैदान छोड़कर नई जर्सी पहननी पड़ी। इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर तस्वीरें और वीडियो तेजी से वायरल होने लगे।

बेल्जियम और मिस्र के मुकाबले में फिर दोहराई गई घटना

तीसरी घटना बेल्जियम और मिस्र के बीच हुए मुकाबले में सामने आई। मिस्र के विंगर मुस्तफा जिको को बेल्जियम के डिफेंडर मैक्सिम डी कुइपर ने रोकने की कोशिश की। इस दौरान उनकी जर्सी बीच से क्षतिग्रस्त हो गई और कपड़े का बड़ा हिस्सा फट गया।

इस घटना के बाद फुटबॉल विशेषज्ञों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया कि क्या जर्सी की मजबूती को हल्के वजन के लिए नजरअंदाज किया गया है।

मोरक्को के खिलाड़ी ने रेफरी को दिखाई फटी जर्सी

स्कॉटलैंड और मोरक्को के मुकाबले में चौथी बार ऐसा दृश्य देखने को मिला। दूसरे हाफ में कॉर्नर किक से पहले मोरक्को के मिडफील्डर नेइल एल आयनाउई और स्कॉटलैंड के डिफेंडर जैक हेंड्री के बीच डिफेंसिव संघर्ष हुआ। इस दौरान आयनाउई की जर्सी बीच से फट गई।

घटना के बाद उन्होंने रेफरी को अपनी फटी हुई जर्सी दिखाकर विरोध भी जताया और पेनाल्टी की मांग की। हालांकि खेल आगे बढ़ गया, लेकिन जर्सी विवाद और गहरा गया।

आखिर सिर्फ PUMA की जर्सियां ही क्यों फट रही हैं?

चारों घटनाओं में एक समानता यह रही कि सभी जर्सियां एक ही निर्माता कंपनी प्यूमा की थीं। फुटबॉल में शारीरिक संघर्ष नई बात नहीं है। हर मैच में खिलाड़ी एक-दूसरे को रोकने के लिए जर्सी पकड़ते हैं और खींचते हैं। इसके बावजूद अन्य कंपनियों की जर्सियों में ऐसी समस्या देखने को नहीं मिली।

यही कारण है कि अब सवाल केवल खिलाड़ियों के संघर्ष तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि जर्सी की गुणवत्ता और उसके निर्माण में इस्तेमाल की गई तकनीक पर भी उठने लगा है।

72 ग्राम की जर्सी बनी बहस का केंद्र

विवाद के केंद्र में कंपनी की ‘अल्ट्राउइव’ (Ultraweave) तकनीक है। कंपनी का दावा है कि यह दुनिया की सबसे हल्की और उन्नत खेल जर्सियों में से एक है। पूरी जर्सी का वजन केवल 72 ग्राम बताया गया है।

इस तकनीक का उद्देश्य खिलाड़ियों को अधिक आराम, कम वजन और तेज मूवमेंट की सुविधा देना है। जर्सी को पुनर्चक्रित पॉलिएस्टर से तैयार किया गया है और इसमें विशेष स्ट्रेच तकनीक का इस्तेमाल किया गया है ताकि खिलाड़ी अधिक सहजता से खेल सकें।

क्या हल्कापन ही बन गया कमजोरी?

खेल विशेषज्ञों का मानना है कि जर्सी को बेहद हल्का और लचीला बनाने की कोशिश कहीं न कहीं उसकी मजबूती पर असर डाल सकती है। जब खिलाड़ी तेज गति और शारीरिक संघर्ष के बीच होते हैं, तब कपड़े पर अधिक दबाव पड़ता है। ऐसे में कमजोर हिस्से जल्दी फट सकते हैं।

हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक तकनीकी रिपोर्ट सामने नहीं आई है, लेकिन लगातार सामने आ रही घटनाओं ने इस बहस को और तेज कर दिया है।

PUMA ने सफाई में क्या कहा?

विवाद बढ़ने के बाद कंपनी ने सफाई देते हुए कहा कि फुटबॉल एक ऐसा खेल है जिसमें खिलाड़ियों के बीच लगातार शारीरिक संपर्क होता है। ऐसे में जर्सियों पर अत्यधिक खिंचाव या दबाव पड़ना स्वाभाविक है। कंपनी का कहना है कि पेशेवर खिलाड़ी हल्की और आरामदायक किट पसंद करते हैं और उसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए यह तकनीक विकसित की गई है।

कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिक दबाव पड़ने की स्थिति में किसी भी जर्सी को नुकसान हो सकता है।

कई बड़ी टीमों की जर्सियां भी यही कंपनी बना रही

गौरतलब है कि यही कंपनी केवल इन चार टीमों की ही नहीं, बल्कि पुर्तगाल, नीदरलैंड्स, स्विट्जरलैंड, सेनेगल, ऑस्ट्रिया, न्यूजीलैंड और आइवरी कोस्ट जैसी कई अन्य राष्ट्रीय टीमों की जर्सियां भी तैयार कर रही है। हालांकि इन टीमों के मैचों में अब तक जर्सी फटने जैसी घटनाएं सामने नहीं आई हैं।

विश्व कप में तकनीक बनाम गुणवत्ता की बहस

फीफा विश्व कप 2026 को आधुनिक तकनीक और नवाचारों का टूर्नामेंट माना जा रहा है। लेकिन जर्सी विवाद ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या खिलाड़ियों को अधिक सुविधा देने की होड़ में उत्पादों की मजबूती से समझौता किया जा रहा है। आने वाले मुकाबलों में इस मुद्दे पर सभी की नजर बनी रहेगी। यदि ऐसी घटनाएं फिर सामने आती हैं, तो खेल सामग्री की गुणवत्ता को लेकर बहस और तेज हो सकती है। फिलहाल विश्व कप में गोल, रोमांच और बड़े उलटफेरों के साथ-साथ फटती जर्सियां भी चर्चा का बड़ा विषय बनी हुई हैं।

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