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सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल को दी छूट, लेकिन समय सीमा तय नहीं- 27 लाख वोटरों का भविष्य अब भी अधर में

SIR विवाद पर अहम निर्देश, नए दस्तावेज जमा करने की अनुमति। मतदान अधिकार को लेकर संशय बरकरार।

By श्वेता सिंह

Apr 07, 2026 14:19 IST

नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) से जुड़े विवाद पर सोमवार को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए, लेकिन सबसे अहम सवाल- ‘डिलीटेड’ वोटरों के अधिकार और अपील निपटाने की समयसीमा-पर कोई स्पष्ट फैसला नहीं दिया। इससे करीब 27 लाख वोटरों के भविष्य को लेकर अनिश्चितता और गहरा गई है।

अदालत ने कहा कि जिन मतदाताओं के नाम सप्लीमेंट्री सूची से हटा दिए गए हैं, वे अपीलीय ट्रिब्यूनल में अपील कर सकते हैं। इसके लिए अगर वे जिला मजिस्ट्रेट (DM) कार्यालय में ऑफलाइन दस्तावेज जमा करते हैं, तो उन्हें रसीद देना अनिवार्य होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई जरूरी दस्तावेज पहले प्रस्तुत नहीं किया गया था, तो उसे अब ट्रिब्यूनल के सामने पेश किया जा सकता है और उस पर विचार किया जाएगा।

ट्राइब्यूनल व्यवस्था अधूरी, जमीनी स्तर पर दिक्कतें

चुनाव आयोग ने 19 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को लेकर अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित करने की अधिसूचना जारी कर दी है। जोका में कार्यालय के लिए स्थान भी तय हो चुका है, लेकिन वास्तविकता यह है कि ट्राइब्यूनल अब तक पूरी तरह से कार्यरत नहीं हो पाया है। इस बीच कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) के पूर्व मुख्य न्यायाधीश हैं केवल टी एस सिवागनानम (T. S. Sivagnanam) ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दो मामलों का निपटारा किया है।

राज्य में लगभग 60 लाख मामले ‘अंडर एडजुडिकेशन’ (विचाराधीन) बताए गए हैं, जिनमें से बड़ी संख्या में वोटरों के नाम हटाए गए हैं। इससे यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि 23 और 29 अप्रैल को होने वाले मतदान में ये मतदाता भाग ले पाएंगे या नहीं।

राज्य सरकार की दलीलें और अदालत की प्रतिक्रिया

राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल (Kapil Sibal) ने अदालत से अपील की कि अंतरिम आदेश जारी कर लाखों लोगों के मतदान अधिकार की रक्षा की जाए। इसी तरह श्याम दीवान (Shyam Divan) ने भी दलील दी कि बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने की दर (करीब 45%) चिंताजनक है। उन्होंने सुझाव दिया कि 15 अप्रैल को ‘कट-ऑफ डेट’ मानकर सभी अपीलों का निपटारा कर दिया जाए और 18 अप्रैल तक अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाए।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस मांग को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची (Justice Joymalya Bagchi) ने टिप्पणी की कि इतनी बड़ी संख्या (26 लाख) में मामलों को 15 दिनों के भीतर निपटाने का निर्देश देने से “अव्यवस्था” पैदा हो सकती है। केंद्र सरकार की ओर से तुषार मेहता (Tushar Mehta) ने भी कहा कि इससे चुनाव कार्यक्रम प्रभावित हो सकता है और अधिसूचना की तारीखों में बदलाव करना पड़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का संतुलित रुख

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (Surya Kant) ने कहा कि अदालत फिलहाल मामले को समाप्त नहीं कर रही है और पहले यह देखना चाहती है कि ट्रिब्यूनल किस तरह काम करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रभावित मतदाता अपने अधिकारों के लिए सिविल कोर्ट या अपीलीय ट्रिब्यूनल का सहारा ले सकते हैं। अदालत ने यह भी बताया कि 60 लाख मामलों में से लगभग 59.15 लाख मामलों का निपटारा न्यायिक अधिकारियों द्वारा किया जा चुका है और प्रक्रिया लगभग पूरी होने की स्थिति में है। अगली सुनवाई 13 अप्रैल को तय की गई है, जिसमें ट्रिब्यूनल के कामकाज और अपीलों की प्रगति की समीक्षा की जाएगी।

नई कमेटी बनाएगी एक समान प्रक्रिया

सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि सभी ट्रिब्यूनल एक समान प्रक्रिया अपनाएं, एक कमेटी बनाने का निर्देश दिया है। इसके तहत कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) के मुख्य न्यायाधीश को तीन वरिष्ठ पूर्व न्यायाधीशों की समिति गठित करने को कहा गया है। यह कमेटी जल्द ही एक समान कार्यप्रणाली तय करेगी, जिसे सभी 19 ट्रिब्यूनल को मानना होगा। साथ ही यह भी तय किया जाएगा कि अपील केवल कोलकाता में दाखिल की जाए या अन्य स्थानों पर भी इसकी सुविधा दी जाए।

मतदाताओं को आंशिक राहत, लेकिन असमंजस जारी

अदालत ने यह स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल नए दस्तावेजों को स्वीकार कर सकता है-जैसे माध्यमिक प्रमाणपत्र आदि और उन्हें जांचकर फैसला ले सकता है। यह उन लोगों के लिए राहत है, जो पहले पर्याप्त दस्तावेज पेश नहीं कर पाए थे। फिर भी, अदालत ने यह भी कहा कि अपील प्रक्रिया में एक-दो महीने का समय लग सकता है, जिससे तत्काल मतदान अधिकार को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है।

सुनवाई के दौरान तीखी नोकझोंक

सुनवाई के दौरान राजनीतिक और कानूनी तनाव भी देखने को मिला। वकील कल्याण बनर्जी (Kalyan Banerjee) ने चुनाव आयोग पर टिप्पणी करते हुए उसे ‘एक्सक्लूजन कमीशन ऑफ इंडिया’ कहा। इस पर आयोग के वकील डी.एस.नायडू (D. S. Naidu) ने कड़ी आपत्ति जताई और तीखी प्रतिक्रिया दी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से अपील प्रक्रिया में पारदर्शिता और कुछ राहत जरूर आई है, लेकिन समयसीमा तय न होने, ट्रिब्यूनल के अधूरे संचालन और चुनाव नजदीक होने के कारण लाखों मतदाताओं के अधिकारों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। अब सबकी नजर 13 अप्रैल की अगली सुनवाई और ट्रिब्यूनल की कार्यप्रणाली पर टिकी है।

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