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वैलेंटाइन डे: प्रेम के उत्सव के इतिहास की रोचक कहानी

क्लॉडियस द्वितीय ने युवाओं के विवाह पर प्रतिबंध लगाया क्योंकि वे अविवाहितों को बेहतर सैनिक मानते थे। संत वैलेंटाइन ने गुप्त रूप से विवाह कराए लेकिन राज़ खुलने पर उन्हें मृत्युदंड दे दिया गया। 14 फ़रवरी को उनके बलिदान की स्मृति में यह दिन प्रेम का प्रतीक बन गया..

By डॉ. अभिज्ञात

Feb 14, 2026 15:11 IST

नयी दिल्लीःफ़रवरी में दुनिया का मिज़ाज बदल जाता है। बाज़ार गुलाबों से महक उठते हैं और चॉकलेट की मिठास बढ़ गयी लगती है। दिल की बात कहने की बेकरारी बढ़ जाती है। क्या आपने कभी सोचा है कि यह दिन केवल रोमांटिक डिनर और उपहारों तक सीमित नहीं, बल्कि सदियों पुरानी कहानियों और अनोखी परंपराओं से जुड़ा है? आइए इस प्रेम पर्व की दिलचस्प परतें खोलते हैं।

एक संत की कहानी से शुरू हुआ सफर

वैलेंटाइन डे का नाम प्राचीन रोम के संत वैलेंटाइन से जुड़ा है। कहा जाता है कि उस समय सम्राट क्लॉडियस द्वितीय ने युवाओं के विवाह पर रोक लगा दी थी। उनका मानना था कि अविवाहित युवक बेहतर सैनिक बनते हैं। लेकिन संत वैलेंटाइन ने प्रेम को नियमों से ऊपर माना। वे चुपचाप प्रेमी जोड़ों का विवाह कराते रहे। जब यह राज़ खुला तो उन्हें कारावास और अंततः मृत्यु दंड दिया गया। 14 फ़रवरी को उनके बलिदान की स्मृति में यह दिन प्रेम का प्रतीक बन गया।

इसी दिन पक्षी अपने साथी चुनते हैं

मध्यकाल में एक और दिलचस्प विश्वास इससे जुड़ गया और लोगों में यह मान्यता प्रचलित हो उठी कि इसी दिन पक्षी अपने साथी चुनते हैं। कवि ज्योफ्री चॉसर जैसे साहित्यकारों ने भी अपनी कविताओं से इस दिन को रोमांस का रंग दिया।

क्यूपिड का तीर और प्रेम का जादू

प्रेम की बात क्यूपिड की चर्चा के बिना अधूरी है। पंखों वाले इस नन्हे देवता के हाथ में धनुष-बाण है। मान्यता है कि उसका स्वर्ण बाण किसी को भी प्रेम में डुबो सकता है।

रोमन कथाओं में वह देवी वीनस का पुत्र माना गया, जबकि यूनानी परंपरा में उसे इरोस कहा गया। एक कथा के अनुसार सीसे का बाण दिल में चुभ जाए तो प्रेम की जगह विरक्ति पैदा होती है।

धीरे-धीरे क्यूपिड वैलेंटाइन डे की पहचान बन गया। पुराने शुभकामना-पत्रों से लेकर आज के सजावटी कार्ड तक, उसकी छवि प्रेम की दस्तक का प्रतीक बन गयी।

दिल से लिखे गए संदेशों की परंपरा

आज वैलेंटाइन कार्ड देना आम बात है। हालांकि इसकी शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी। माना जाता है कि पंद्रहवीं शताब्दी में एक राजकुमार ने कैद के दौरान अपनी पत्नी को प्रेम-पत्र लिखा और उसे “मेरी प्रिय वैलेंटाइन” कहा।

इसके बाद हाथ से बने कार्डों का चलन बढ़ा। लोग उनमें कविताएँ, दिल के चित्र और सजावट जोड़ते थे। उन्नीसवीं शताब्दी में छपे हुए सुंदर कार्ड बाज़ार में आने लगे और देखते ही देखते यह परंपरा व्यापक हो गई। आज यह दिन केवल प्रेमी-प्रेमिकाओं के लिए नहीं, बल्कि दोस्तों, परिवार और शिक्षकों तक के लिए शुभकामनाएँ भेजने का अवसर बन गया है।

वैलेंटाइन हुआ खट्टा-मीठा

एक समय ऐसा भी था जब वैलेंटाइन डे पर केवल मीठे संदेश ही नहीं भेजे जाते थे। उन्नीसवीं सदी में “विनेगर वैलेंटाइन” नामक कार्ड प्रचलित थे। इनमें व्यंग्य, चुटकी या कभी-कभी तीखी टिप्पणी होती थी। लोग गुमनाम रूप से ऐसे कार्ड भेजते और किसी का मज़ाक उड़ाते। हालांकि समय के साथ यह चलन खत्म हो गया और प्रेम दिवस फिर से सकारात्मक भावनाओं का प्रतीक बन गया।

रोमांस नहीं दोस्ती भी

हर देश में यह दिन एक जैसा नहीं मनाया जाता। कुछ स्थानों पर 14 फ़रवरी को मित्रता दिवस की तरह मनाया जाता है, जहाँ लोग अपने दोस्तों और परिवार के साथ स्नेह बाँटते हैं। अब वैलेंटाइन डे केवल दो दिलों की कहानी नहीं है। यह आत्म-प्रेम, दोस्ती और अपनेपन का भी उत्सव बन चुका है।

यह दिन हमें याद दिलाता है कि प्रेम सिर्फ़ शब्दों में नहीं, बल्कि छोटे-छोटे भावों और सच्ची नीयत में बसता है।

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