नयी दिल्लीः तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी आंतरिक राजनीतिक संघर्ष अब खुलकर सामने आने लगा है। पार्टी सांसद कीर्ति आजाद ने बागी सांसदों के उस समूह पर तीखा हमला बोला है, जिसने हाल ही में नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) के साथ विलय का रास्ता चुना है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ही वास्तविक और जनाधार वाली पार्टी है, जबकि बागी गुट की राजनीतिक विश्वसनीयता बेहद सीमित है।
नई दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कीर्ति आजाद ने कहा कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में दो अलग-अलग टीमें दिखाई दे रही हैं। एक तरफ जोड़ा फूल वाले चुनाव चिह्न के साथ ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस है, जबकि दूसरी तरफ कलम की नीब वाले चुनाव चिह्न के साथ एनसीपीआई में शामिल हुआ बागी समूह है।
जनादेश का हवाला देकर किया दावा
कीर्ति आजाद ने हालिया चुनाव परिणामों का जिक्र करते हुए कहा कि तमाम राजनीतिक चुनौतियों और विरोधी परिस्थितियों के बावजूद तृणमूल कांग्रेस को करीब 2 करोड़ 60 लाख वोट मिले, जो कुल मतों का लगभग 41 प्रतिशत है। उनके अनुसार यह आंकड़ा बताता है कि जनता का विश्वास अब भी ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के साथ मजबूती से खड़ा है।
उन्होंने कहा कि जिन नेताओं ने पार्टी छोड़कर अलग रास्ता चुना है, उनके पास ऐसा जनाधार या राजनीतिक समर्थन नहीं है, जिससे वे खुद को टीएमसी के बराबर खड़ा कर सकें।
लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका पर टिकी निगाहें
इस बीच टीएमसी के दोनों गुटों के बीच विवाद संसद तक पहुंच गया है। सूत्रों के अनुसार लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला दोनों पक्षों की दलीलें सुनने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रहे हैं। अध्यक्ष कार्यालय की ओर से ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले सांसदों के समूह को औपचारिक बैठक के लिए आमंत्रित किया गया है।
बताया जा रहा है कि अध्यक्ष बागी सांसदों की स्थिति और उनकी मांगों पर अंतिम निर्णय लेने से पहले दोनों पक्षों की बात विस्तार से सुनेंगे। ऐसे में संसद के भीतर टीएमसी की मान्यता और प्रतिनिधित्व को लेकर आने वाले दिनों में महत्वपूर्ण फैसला सामने आ सकता है।
अलग बैठने की मांग से शुरू हुआ नया विवाद
14 जून को वरिष्ठ सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय के नेतृत्व में बागी गुट ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की थी। इस दौरान उन्होंने संसद में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग करते हुए अपना पक्ष रखा था।
बागी सांसदों का कहना है कि एनसीपीआई में विलय के बाद उनकी राजनीतिक स्थिति बदल गई है और उन्हें स्वतंत्र समूह के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए। इसी आधार पर उन्होंने संसद में अलग पहचान और बैठने की व्यवस्था की मांग उठाई है।
दल-बदल कानून से बचने का दावा
बागी गुट का दावा है कि उनका कदम संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून के दायरे में पूरी तरह वैध है। उनका कहना है कि किसी भी राजनीतिक दल के विलय को मान्यता मिलने के लिए कम से कम दो-तिहाई सांसदों का समर्थन आवश्यक होता है।
गुट के नेताओं के अनुसार उनके साथ 20 सांसद हैं, जो निर्धारित सीमा से अधिक संख्या है। इसी वजह से वे मानते हैं कि उनका एनसीपीआई में विलय कानूनी रूप से स्वीकार्य है और उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होगा।
अचानक चर्चा में आई एनसीपीआई
त्रिपुरा आधारित नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया अब राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का केंद्र बन गई है। अब तक सीमित संगठनात्मक मौजूदगी रखने वाली इस पार्टी को टीएमसी के बागी सांसदों के शामिल होने से नई पहचान मिली है।
पार्टी के राष्ट्रीय संगठन सचिव शांतनु डे ने इस घटनाक्रम का स्वागत करते हुए कहा है कि नए नेताओं के आने से संगठन को मजबूती मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास और शासन संबंधी दृष्टिकोण के अनुरूप काम करना चाहती है।
बंगाल की राजनीति में बढ़ सकती है हलचल
टीएमसी के भीतर पैदा हुआ यह विवाद केवल पार्टी संगठन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पश्चिम बंगाल की राजनीति और संसद में पार्टी की स्थिति पर भी पड़ सकता है। एक ओर ममता बनर्जी का नेतृत्व वाला गुट अपनी वैधता और जनाधार का दावा कर रहा है, तो दूसरी ओर बागी सांसद कानूनी और संसदीय आधार पर अलग पहचान हासिल करने की कोशिश में जुटे हैं।
अब सभी की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष के फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि संसद के भीतर टीएमसी की असली ताकत किसके हाथ में मानी जाएगी।